जोधपुर में शीतला अष्टमी का ऐतिहासिक मेला: 350 वर्षों की परंपरा का महोत्सव 


के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा  2025-03-24 05:17:49



 

जोधपुर के कागा क्षेत्र में स्थित शीतला माता मंदिर में इस वर्ष भी शीतला अष्टमी का मेला धूमधाम से मनाया जा रहा है। 350 वर्षों से चली आ रही इस परंपरा के पीछे एक रोचक ऐतिहासिक घटना छिपी है, जिसने सप्तमी की बजाय अष्टमी को पूजन का कारण बनाया।

शीतला अष्टमी का महोत्सव: जोधपुर की अनूठी परंपरा

राजस्थान के जोधपुर शहर में शीतला अष्टमी का पर्व विशेष उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। जबकि अधिकांश स्थानों पर यह पर्व होली के सात दिन बाद सप्तमी को मनाया जाता है, जोधपुर में यह परंपरा अष्टमी को मनाने की है। इस विचलन के पीछे एक ऐतिहासिक घटना है, जो महाराजा विजय सिंह के समय से जुड़ी है।

महाराजा विजय सिंह और शीतला माता की मूर्ति का निष्कासन

सन् 1752 में महाराजा बखत सिंह के निधन के बाद उनके पुत्र विजय सिंह जोधपुर के महाराजा बने। कुछ वर्षों बाद, चेचक (शीतला माता) के प्रकोप से उनके पुत्र की मृत्यु सप्तमी के दिन हो गई। इस दुखद घटना से व्यथित होकर महाराजा विजय सिंह ने शीतला माता की मूर्ति को शहर से निष्कासित करने का आदेश दिया। परिणामस्वरूप, जूनी मंडी स्थित शीतला माता की मूर्ति को कागा पहाड़ी के निकट श्मशान क्षेत्र में स्थापित किया गया। इस घटना के बाद से जोधपुर में शीतला माता की पूजा सप्तमी के बजाय अष्टमी को की जाने लगी।

कागा शीतला माता मंदिर: श्रद्धा का केंद्र

कागा क्षेत्र में स्थित शीतला माता मंदिर अब जोधपुरवासियों के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र बन चुका है। यहां प्रतिवर्ष शीतला अष्टमी के अवसर पर सात दिवसीय मेले का आयोजन होता है, जिसमें हजारों श्रद्धालु भाग लेते हैं। मेले के दौरान मंदिर 24 घंटे खुला रहता है, ताकि भक्तजन किसी भी समय माता के दर्शन कर सकें। मेले का शुभारंभ शुक्रवार देर शाम ध्वजारोहण के साथ हुआ, जिसके बाद से भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी।

सुरक्षा और सुविधाएं: मेले की व्यवस्थाएं

मेले के दौरान सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। मेला संयोजक धर्माराम भाटी के अनुसार, पूरे क्षेत्र में सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं और पुलिस का अतिरिक्त जाप्ता तैनात किया गया है। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए यातायात व्यवस्था में भी आवश्यक परिवर्तन किए गए हैं, ताकि मेले में आने-जाने में किसी प्रकार की असुविधा न हो।

गेर नृत्य: मेले की विशेष आकर्षण

मेले के पहले तीन दिनों में गेर नृत्य का आयोजन विशेष आकर्षण का केंद्र होता है। पारंपरिक वेशभूषा में पुरुषों का यह नृत्य राजस्थान की सांस्कृतिक धरोहर को प्रदर्शित करता है। गेर नृत्य के माध्यम से कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं, जो दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता है।

नवजात शिशुओं की ढोक: एक विशेष परंपरा

शीतला अष्टमी के मेले में एक विशेष परंपरा यह है कि श्रद्धालु अपने नवजात शिशुओं को माता के दर्शन कराने के लिए लाते हैं। इसे 'ढोक दिलाना' कहा जाता है, जो शिशुओं के स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए शुभ माना जाता है। यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

इतिहास और परंपरा का संगम

करीब साढ़े तीन सौ साल पहले जोधपुर में शीतला सप्तमी को ही यह पर्व मनाया जाता था, लेकिन महाराजा विजय सिंह के पुत्र की मृत्यु के बाद से यह परंपरा बदल गई। तब से जोधपुर सहित मारवाड़ के कस्बों में ज्यादातर अष्टमी को ही शीतला माता का पूजन होता है। यह परिवर्तन जोधपुर की सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।

जोधपुर का शीतला अष्टमी मेला न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह शहर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को भी प्रदर्शित करता है। सदियों पुरानी इस परंपरा में हर वर्ष हजारों श्रद्धालुओं की भागीदारी इसे और भी विशेष बनाती है। सुरक्षा, सुविधा और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ यह मेला जोधपुरवासियों के लिए एक महत्वपूर्ण आयोजन है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा स्रोत बना रहेगा।


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