चिकित्सा विज्ञान में मील का पत्थर: ABO इन-कंपैटिबल लिवर ट्रांसप्लांट से मरीज की जान बची!


के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा  2025-03-22 18:49:12



 

राजस्थान की राजधानी जयपुर के सीतापुरा स्थित एक निजी अस्पताल के सेंटर फॉर डाइजेस्टिव साइंसेज के लिवर ट्रांसप्लांट विशेषज्ञों ने चिकित्सा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। उन्होंने राज्य के पहले ABO असंगत (इन- कंपैटिबल) लिवर प्रत्यारोपण को सफलतापूर्वक अंजाम दिया है। इस प्रक्रिया में एक गंभीर लिवर रोगी को अलग ब्लड ग्रुप वाले डोनर का लिवर प्रत्यारोपित किया गया, जो पूरी तरह सफल रहा। यह सफलता उन मरीजों के लिए नई उम्मीद लेकर आई है, जिनके पास मेल खाते ब्लड ग्रुप वाला डोनर उपलब्ध नहीं होता।

मरीज की गंभीर स्थिति

बूरथल निवासी 44 वर्षीय मदन गोपाल मीना पिछले डेढ़ वर्ष से पीलिया से पीड़ित थे, जिसके कारण उन्हें बार-बार अस्पताल में भर्ती होना पड़ता था। उन्हें पेट में पानी भरना, बार-बार बेहोशी जैसी समस्याएं हो रही थीं, और उनकी स्थिति लिवर फेलियर तक पहुंच गई थी। जब उन्हें बेहोशी की हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया, तो डॉक्टरों ने लिवर प्रत्यारोपण को ही उनकी जान बचाने का एकमात्र उपाय बताया।

ब्लड ग्रुप की असंगति: एक बड़ी चुनौती

प्रत्यारोपण के दौरान सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि मरीज और डोनर के ब्लड ग्रुप मेल नहीं खा रहे थे। मदन गोपाल का ब्लड ग्रुप बी पॉजिटिव था, जबकि उनकी पत्नी बसना देवी, जो डोनर बनने के लिए तैयार थीं, का ब्लड ग्रुप ए पॉजिटिव था। सामान्यतः, प्रत्यारोपण के लिए मरीज और डोनर का ब्लड ग्रुप समान होना आवश्यक होता है, लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं था।

विशेष चिकित्सा प्रक्रिया: प्लाज्मा फेरेसिस और इम्यूनोमॉड्यूलेशन

इस चुनौती का सामना करने के लिए डॉक्टरों ने विशेष चिकित्सा प्रक्रियाओं का सहारा लिया। लिवर सर्जरी विशेषज्ञ डॉ. नैमिष एन मेहता के नेतृत्व में टीम ने प्लाज्मा फेरेसिस की मदद से मरीज के शरीर से 'ए' एंटीबॉडीज को कम किया, ताकि डोनर के लिवर को शरीर अस्वीकार न करे। इसके अलावा, मरीज को इम्यूनोमॉड्यूलेशन थेरेपी भी दी गई, जिससे प्रतिरक्षा प्रणाली को नियंत्रित किया जा सके। ये प्रक्रियाएं ऑपरेशन से कुछ दिन पहले की गईं, जिससे प्रत्यारोपण सफल हो सके।

सफल प्रत्यारोपण: चिकित्सा विज्ञान में मील का पत्थर

इन विशेष प्रक्रियाओं के बाद, डोनर से प्राप्त लिवर के हिस्से को मरीज के शरीर में प्रत्यारोपित किया गया। ब्लड में एंटीबॉडीज की कमी के कारण, मरीज के शरीर ने नए लिवर को स्वीकार कर लिया और प्रत्यारोपण पूरी तरह सफल रहा। यह राजस्थान में अपनी तरह का पहला मामला है, जहां ABO असंगत लिवर प्रत्यारोपण किया गया है। इस सफलता ने उन मरीजों के लिए भी जीवन की नई राह खोली है, जिनके पास मेल खाते ब्लड ग्रुप वाला डोनर उपलब्ध नहीं होता।

भविष्य की संभावनाएं और चुनौतियां

इस सफलता के बावजूद, ABO असंगत लिवर प्रत्यारोपण एक जटिल और जोखिमभरी प्रक्रिया है, जिसमें विशेष तकनीकों और अनुभव की आवश्यकता होती है। हालांकि, इस उपलब्धि ने चिकित्सा विज्ञान में नई संभावनाओं के द्वार खोले हैं और भविष्य में ऐसे और भी प्रत्यारोपण संभव हो सकेंगे। यह सफलता न केवल राजस्थान के लिए, बल्कि पूरे देश के चिकित्सा क्षेत्र के लिए गर्व का विषय है।


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