हस्तलेखन विशेषज्ञता पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती: साक्ष्य मूल्यांकन में सावधानी की नसीहत


के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा  2025-03-14 07:51:41



 

क्या न्यायालय में विशेषज्ञ गवाही हमेशा भरोसेमंद होती है? सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसले में इस प्रश्न पर प्रकाश डाला है, विशेष रूप से हस्तलेखन विशेषज्ञों की गवाही के संदर्भ में। यह निर्णय न्यायिक प्रक्रिया में विशेषज्ञ साक्ष्य की विश्वसनीयता और उसके मूल्यांकन पर नए मानदंड स्थापित करता है।

विशेषज्ञ साक्ष्य की विश्वसनीयता पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने अपने हालिया फैसले में कहा है कि विशेषज्ञ साक्ष्य, विशेष रूप से हस्तलेखन विशेषज्ञों की गवाही, हमेशा पूर्ण रूप से विश्वसनीय नहीं होती। इसलिए, न्यायालयों को ऐसे साक्ष्य पर निर्भर करते समय सावधानी बरतनी चाहिए। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने एक आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान की।

मामले की पृष्ठभूमि: जालसाजी और आपराधिक साजिश के आरोप

मामला एक अभियुक्त से संबंधित था, जिसे भारतीय दंड संहिता की धारा 120बी (आपराधिक साजिश), 468 (धोखाधड़ी के उद्देश्य से जालसाजी) और 471 (जाली दस्तावेज का वास्तविक के रूप में उपयोग) के तहत दोषी ठहराया गया था। आरोप था कि अभियुक्त ने एमबीबीएस कोर्स में प्रवेश के लिए एक नकली अंकपत्र का उपयोग किया था।

प्रमाण के रूप में हस्तलेखन विशेषज्ञ की गवाही

अभियोजन पक्ष ने एक हस्तलेखन विशेषज्ञ की गवाही पर भरोसा किया, जिसने कहा कि एक पोस्टल कवर पर लिखावट अभियुक्त की थी। हालांकि, उस पोस्टल कवर को साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया था, और अभियोजन पक्ष उसके अस्तित्व को साबित करने में विफल रहा।

अभियुक्त की दलील: मूल दस्तावेज की अनुपस्थिति में विशेषज्ञ की राय अविश्वसनीय

अभियुक्त ने अपनी सजा को चुनौती देते हुए तर्क दिया कि मूल पोस्टल कवर की अनुपस्थिति में हस्तलेखन विशेषज्ञ की राय पर भरोसा नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार किया और पाया कि अभियोजन पक्ष उस विवादित पोस्टल कवर के अस्तित्व को साबित करने में असफल रहा है।

मुरारी लाल बनाम मध्य प्रदेश राज्य: एक महत्वपूर्ण संदर्भ

कोर्ट ने मुरारी लाल बनाम मध्य प्रदेश राज्य (1980) 1 एससीसी 704 मामले का उल्लेख किया, जिसमें विशेषज्ञ साक्ष्य के मूल्यांकन के सिद्धांत स्थापित किए गए थे। उस मामले में कहा गया था कि हस्तलेखन विशेषज्ञ की राय को हमेशा पुष्टि की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन न्यायालयों को ऐसे साक्ष्य पर भरोसा करते समय सावधानी बरतनी चाहिए।

विशेषज्ञ साक्ष्य के मूल्यांकन में सावधानी की आवश्यकता

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि विशेषज्ञ साक्ष्य को स्वीकार करने से पहले उसकी सावधानीपूर्वक जांच आवश्यक है। विशेषज्ञ की राय के पीछे के तर्क की गहन समीक्षा की जानी चाहिए, और मामले के तथ्यों के आधार पर पुष्टि की आवश्यकता हो सकती है।

मूल दस्तावेज की अनुपस्थिति में विशेषज्ञ राय की सीमाएं

कोर्ट ने पाया कि विवादित पोस्टल कवर को साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया था, जिससे हस्तलेखन विशेषज्ञ की राय का मूल्य कम हो गया। इसलिए, अभियुक्त की सजा को बरकरार रखना उचित नहीं था, और उसे बरी कर दिया गया।

न्यायालयों के लिए मार्गदर्शन: विशेषज्ञ साक्ष्य पर निर्भरता में संतुलन

यह फैसला न्यायालयों को विशेषज्ञ साक्ष्य पर निर्भरता में संतुलन बनाने की आवश्यकता की याद दिलाता है। विशेषज्ञ की राय महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन उसे अन्य साक्ष्यों के साथ मिलाकर सावधानीपूर्वक मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

न्यायिक प्रक्रिया में विशेषज्ञ साक्ष्य की भूमिका पर पुनर्विचार

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय न्यायिक प्रक्रिया में विशेषज्ञ साक्ष्य की भूमिका और उसकी विश्वसनीयता पर पुनर्विचार करने का अवसर प्रदान करता है। यह न्यायालयों को साक्ष्य के मूल्यांकन में अधिक सतर्क और विवेकपूर्ण बनने की प्रेरणा देता है, जिससे न्याय की निष्पक्षता सुनिश्चित हो सके।


global news ADglobal news AD