बीकानेर में थियेटर फेस्टिवल इधर अधिकारियों के नाटकों का भी कोई जवाब नहीं ! ———— मनोहर चावला
बीकानेर में थियेटर फेस्टिवल इधर अधिकारियों के नाटकों का भी कोई जवाब नहीं ! ———— मनोहर चावला 2025-03-11 06:45:44

बीकानेर के रंगकर्मियों ने अपने अभिनय से प्रदेश और देश में अपना स्थान बनाया हैं। आज भी सुधीर व्यास, प्रदीप भटनागर, लक्ष्मी नारायण सोनी, सुरेश हिंदुस्तानी, हरीश बी शर्मा, मधु आचार्य और बी नवीन शर्मा का नाम बड़े फ़क्र से लिया जाता है। अभी ८ से १२ मार्च तक बीकानेर थियेटर फेस्टिवल में रंगकर्मी अपना बेहतरीन प्रदर्शन कर रहे है। बीकानेर शहर इन दिनों होली के रंग के साथ नाटकों के रंग में भी रंगा नज़र आ रहा है यही नहीं हमारे बीकानेर में नाटक मंचन करने वालों की एक और नक़ली जामात भी हैं। वो छोटे छोटे नुक्कड़ नाटक मंचन कर जनता का ध्यान अपनी और आकर्षित करती हैं। होली पर्व को देखते हुए इस नाटक मंडली ने कमला कालोनी में सड़े- गले मावे को नष्ठ किया। हजारों का बुदबुदार नमकीन नष्ट किया, सेंकड़ो टन चासनी ढुलवाई, हज़ारो लीटर मिलावटी दूध को फिंकवाया, कई जगह मिलावटी मिठाई फिंकवाई, हज़ारो टन नक़ली घी पकड़ा, सड़े हुए तेल की कचौड़ियाँ पकड़ी। लेकिन फिर हुआ क्या? क्या कोई आपने गिरफ़्तारी की, क्या किसी को कोई जेल हुई ?नहीं। कुछ भी नहीं बस एक दिन का नुक्कड़ नाटक आपने किया। भीड़ इकट्ठी की और अखबारो में पब्लिसिटी ले ली। फिर सब कुछ वैसे ही चलने लगा। जैसे पहले था। क्या आपने कभी चाँदमल भीखाराम— या हल्दी राम के मिठाईयो के नमूने लिए नहीं। क्योंकि वो बडे ब्रांड है। उनकी मिठाई और नमकीन गंगा की तरह पवित्र है। छोटे छोटे दुकानदारों या फिर ठेले वालों के सैम्पल लेकर आपने नाटक का मंचन कर लिया। माना कि यह छोटे दुकानदार या ठेले वाले दूध के धुले नहीं है लेकिन जनता को दिखते रहना चाहिए कि हम कितने एक्टिव हैं। मिलावट के खिलाप हम अभियान चलाए हुए है जबकि इनसे कुछ छिपा नहीं कि कहाँ कहाँ मिलावट होती हैं ?लेकिन आप जानते हुए भी अनजान बने रहते है। एसिड से बना दूध ,दही, पनीर खुले आम बिक रहा है पामआयल से बना घी बिक रहा है। मिर्च- मसाले सब बाज़ार में नक़ली बिक रहे है। और बिकते रहेंगे और तो और बड़े बड़े मॉल में भी एक्सपायरी डेट के समान खुले आम बिक रहे है लेकिन आपको इससे क्या? आपका घर सुख- सुविधाओं से बढ़ता रहेंगा। ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार रूपी गंगा बह रही है। सब लोग जम के डुबकी लगा रहे हैं। मानो इस गंगा में उनके पाप धुल रहे हो, अब आप देखो इनको अच्छी तरह से मालूम हैं कि एक दवाई की दुकानदार का फ़ार्मेसी लाइसेंस कम से कम दस दवाई की दुकानों पर लगा होता है इसी प्रकार रोगी के जाँच केन्द्र का पैथोलॉजी लाइसेंस हर जाँच केन्द्र पर टंगा होता है। पैथोलॉजी का डाक्टर एक हैं उसका नाम दस से भी ज़्यादा पैथोलॉजी सेंटर पर मिलेगे । इन्होंने जाँच फ़ार्म पर एडवांस दस्तक कर रखे होते है। अप्रशिक्षित टेक्नीशियन जो जाँच रिपोर्ट बनाता है। वो साइन किए हुए फार्मो पर टाईप कर देता है। जब जाँचे ही ग़लत होगी तो फिर इलाज सही कैसा होगा ? कुछ जाँच करने वाले अनपढ़ लोग डाक्टरों को फ़ोन करके पूछते भी है सर, आप ही बताइए क्या लिखना हैं? कौनसा रोग बताना है जबकि मरीज़ बाहर बैठा सुन रहा होता है कि उसे हलाल किया जाना है। उसे लूटने का पूरा माहोल बना लिया जाता है। यह सम्बन्धित अधिकारी सब कुछ जानते है। कुछ भी छुपा नहीं है इनसे लेकिन इन्हे गांधी जी वाला नोट दिखाकर नाटक और सिर्फ़ नाटक करने को कहा जाता है। नाटक ऐसा हो, जो वास्तविक लगे कि लोगो दांतों तले उँगली दबाए। अब इनके सामने नाटक फेस्टिवल भी फीका है। जहां जहां सेटिंग नहीं है वहाँ ऐसे नुक्कड़ नाटक ज़्यादा होते है। इनका इतना बड़ा और ज़बरदस्त नेट वर्क है। जिसे कोई नहीं तोड़ सकता। उम्मीद थी सरकार बदलने से शायद कुछ बदले। लेकिन नहीं , अब तो उलटा खुल के खेलने वाली प्रवति हो गई है। कोई क़ानून का डर नहीं। बस आप तो इनके नाटक देखते जाओ। और वाह- वाह करते जाओ। वैसे भी बीकानेर नाटकों का घर है ८ से १२मार्च तक राष्ट्रीय नाटकों का मंचन हो रहा है जिसमे पाँच सौ से ज़्यादा कलाकार भाग ले रहे है । समाज में फैले दूषित वातावरण को सजीव तरीक़े से इन्होंने अपने नाटकों के माध्यम से दर्शाया है बधाई के पात्र है ये रंगकर्मी जिन्होंने प्रशासन को आईना तो दिखाया। लेकिन गूँगे- बहरे लोगो के आगे —बीन बजाने जैसा ही हुआ।