कंपनी कानून में नया मील का पत्थर: सुप्रीम कोर्ट ने निदेशकों की जिम्मेदारी पर दी महत्वपूर्ण व्याख्या
के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा 2025-03-09 15:36:08

कंपनी के निदेशकों की जिम्मेदारियों और दायित्वों को लेकर अक्सर कानूनी विवाद होते रहे हैं। हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे मामले में अपना निर्णय सुनाया जिसने इस विषय पर नई स्पष्टता प्रदान की है। यह निर्णय न केवल कानूनी विशेषज्ञों के लिए बल्कि कॉर्पोरेट जगत के लिए भी महत्वपूर्ण है।
मामले की पृष्ठभूमि:
यह मामला एक कंपनी के गैर-कार्यकारी निदेशकों के खिलाफ दायर आपराधिक शिकायत से संबंधित था, जिसमें कंपनी द्वारा जारी किए गए चेक बाउंस होने के कारण उन्हें जिम्मेदार ठहराया गया था। शिकायतकर्ता ने दावा किया कि निदेशकों को कंपनी के वित्तीय लेन-देन की जानकारी थी और इसलिए वे इस चूक के लिए जिम्मेदार हैं।
सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण:
न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि गैर-कार्यकारी और स्वतंत्र निदेशकों को तब तक कंपनी के अपराधों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता जब तक उनकी प्रत्यक्ष संलिप्तता सिद्ध न हो। केवल निदेशक पद पर होना पर्याप्त नहीं है; उनकी सक्रिय भूमिका और निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी का प्रमाण आवश्यक है।
प्रतिनिधि जिम्मेदारी का सिद्धांत:
कोर्ट ने प्रतिनिधि जिम्मेदारी के सिद्धांत पर जोर देते हुए कहा कि किसी निदेशक को कंपनी के अपराधों के लिए तभी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है जब कानून में ऐसा विशेष प्रावधान हो और उनकी सक्रिय भूमिका के पर्याप्त सबूत हों। यह निर्णय इस सिद्धांत को मजबूत करता है कि केवल पद धारण करना जिम्मेदारी का आधार नहीं हो सकता।
पूर्व के निर्णयों का संदर्भ:
कोर्ट ने अपने निर्णय में महाराष्ट्र राज्य विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड बनाम दातार स्विचगियर लिमिटेड (2010), शाम सुंदर बनाम हरियाणा राज्य (1989), और सुनील भारती मित्तल बनाम सीबीआई (2015) जैसे मामलों का उल्लेख किया, जिनमें यह स्पष्ट किया गया था कि निदेशकों को उनकी सक्रिय भागीदारी के बिना कंपनी के अपराधों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय कंपनी कानून में निदेशकों की जिम्मेदारियों को लेकर एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह निर्णय सुनिश्चित करता है कि गैर-कार्यकारी और स्वतंत्र निदेशकों को बिना उचित आधार के आपराधिक मामलों में घसीटा नहीं जा सकता, जिससे कॉर्पोरेट गवर्नेंस में पारदर्शिता और न्याय सुनिश्चित होगा।