सुप्रीम कोर्ट की सख्ती: भ्रष्टाचार के आरोप में अग्रिम जमानत से इनकार


  2025-03-09 15:33:56



 

हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में एक लोक सेवक को अग्रिम जमानत देने से इनकार किया, जो अवैध रिश्वत मांगने के आरोप का सामना कर रहा था। यह निर्णय न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ द्वारा सुनाया गया, जिसमें भ्रष्टाचार जैसे गंभीर अपराधों में अग्रिम जमानत देने में सतर्कता बरतने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।

भ्रष्टाचार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की सख्ती

सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि अग्रिम जमानत केवल असाधारण परिस्थितियों में ही दी जानी चाहिए, जब यह स्पष्ट हो कि आरोपी को झूठा फंसाया गया है या आरोप निराधार हैं। पीठ ने कहा, "अभियुक्त की स्वतंत्रता के प्रति अत्यधिक संवेदनशीलता कभी-कभी सार्वजनिक न्याय के उद्देश्य को पराजित कर सकती है।" यह टिप्पणी न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ द्वारा की गई।

अनुच्छेद 21 की व्याख्या और अग्रिम जमानत का अधिकार

आरोपी ने तर्क दिया कि जब हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता नहीं है, तो अग्रिम जमानत से इनकार करना संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। हालांकि, कोर्ट ने राज्य बनाम राम किशन बालोतिया मामले का संदर्भ देते हुए कहा कि अग्रिम जमानत देना अधिकार नहीं है और इसे केवल तभी दिया जाना चाहिए जब अदालत प्रथम दृष्टया संतुष्ट हो कि आरोपी को झूठा फंसाया गया है या आरोप निराधार हैं।

असाधारण परिस्थितियों में ही अग्रिम जमानत संभव

कोर्ट ने कहा, "भ्रष्टाचार जैसे गंभीर अपराध में अग्रिम जमानत देने के लिए आवश्यक मानदंडों को पूरा किया जाना चाहिए। अग्रिम जमानत केवल असाधारण परिस्थितियों में दी जा सकती है, जब अदालत प्रथम दृष्टया मानती है कि आवेदक को झूठा फंसाया गया है या आरोप राजनीतिक रूप से प्रेरित या निराधार हैं।" इस मामले में, आरोपी द्वारा अग्रिम जमानत के लिए कोई असाधारण परिस्थिति नहीं बताई गई थी और अभियोजन में कोई निराधारता नहीं थी।

भ्रष्टाचार मुक्त समाज के लिए स्वतंत्रता पर प्रतिबंध आवश्यक

कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि भ्रष्टाचार मुक्त समाज सुनिश्चित करने के लिए आरोपी की स्वतंत्रता से इनकार करना आवश्यक है, तो अदालतों को ऐसा करने में संकोच नहीं करना चाहिए। कोर्ट ने कहा, "यदि भ्रष्टाचार मुक्त समाज सुनिश्चित करने के लिए आरोपी की स्वतंत्रता से इनकार करना आवश्यक है, तो अदालतों को ऐसा करने में संकोच नहीं करना चाहिए।" यह टिप्पणी न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ द्वारा की गई।

राम किशन बालोतिया मामले का संदर्भ

राम किशन बालोतिया मामले में, कोर्ट ने कहा था कि अग्रिम जमानत संविधान के अनुच्छेद 21 का अभिन्न हिस्सा नहीं है और इसे भ्रष्टाचार जैसे गंभीर अपराधों में नकारा जा सकता है। कोर्ट ने कहा, "हम इस तर्क को स्वीकार करना कठिन पाते हैं कि सीआरपीसी की धारा 438 संविधान के अनुच्छेद 21 का अभिन्न हिस्सा है। पहले की आपराधिक प्रक्रिया संहिता में धारा 438 के समान कोई प्रावधान नहीं था। अग्रिम जमानत को अधिकार के रूप में नहीं दिया जा सकता। यह मूल रूप से संविधान के लागू होने के बाद लंबे समय बाद प्रदान किया गया एक वैधानिक अधिकार है। इसे संविधान के अनुच्छेद 21 का आवश्यक घटक नहीं माना जा सकता। और इसे कुछ विशेष श्रेणी के अपराधों पर लागू न करना अनुच्छेद 21 का उल्लंघन नहीं माना जा सकता।"

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला एक ऑडिट इंस्पेक्टर से संबंधित था, जिस पर ग्राम पंचायत के विकास कार्यों के ऑडिट के संबंध में रिश्वत मांगने का आरोप था। सह-आरोपी को आरोपी की ओर से रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया था, और एक ऑडियो रिकॉर्डिंग में आरोपी को सह-आरोपी को रिश्वत की राशि तीसरे पक्ष को हस्तांतरित करने का निर्देश देते हुए सुना गया था। पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी, जिसके बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए याचिका खारिज कर दी और उच्च न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखा।

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भ्रष्टाचार के खिलाफ न्यायपालिका की सख्त रुख को दर्शाता है। यह स्पष्ट संदेश देता है कि भ्रष्टाचार जैसे गंभीर अपराधों में अग्रिम जमानत केवल असाधारण परिस्थितियों में ही दी जानी चाहिए, जिससे न्याय प्रणाली में जनता का विश्वास बना रहे।


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