न्याय की अवमानना नहीं होगी बर्दाश्त: सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय
के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा 2025-03-08 18:26:15

क्या अदालत के आदेशों की अवहेलना अब भी मुमकिन है? सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि आदेशों की अवहेलना करने वालों को अब सख्त सजा का सामना करना पड़ेगा, चाहे बाद में आदेश रद्द ही क्यों न हो जाए।
अदालती आदेशों की अवहेलना पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त संदेश
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि कोई पक्ष अदालत के आदेश का उल्लंघन करता है, तो आदेश के बाद में रद्द होने के बावजूद, उस पक्ष को अवमानना के लिए उत्तरदायी ठहराया जा सकता है। यह निर्णय न्यायमूर्ति पंकज मित्तल और न्यायमूर्ति संजय करोल की पीठ ने सुनाया।
ऑर्डर 39 रूल 2ए की व्याख्या
यह निर्णय सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के ऑर्डर 39 रूल 2ए के संदर्भ में दिया गया, जो उन व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई करने का प्रावधान करता है जो निषेधाज्ञा आदेशों का उल्लंघन करते हैं। रूल 2ए (1) के तहत, उल्लंघन करने वाले पक्ष को संपत्ति की कुर्की या तीन महीने तक की कारावास की सजा दी जा सकती है।
समी खान बनाम बिंदू खान मामला: एक मिसाल
इस संदर्भ में, सुप्रीम कोर्ट ने समी खान बनाम बिंदू खान (1998) 7 एससीसी 59 मामले का हवाला दिया, जिसमें यह निर्णय लिया गया था कि "भले ही निषेधाज्ञा आदेश बाद में रद्द कर दिया जाए, उल्लंघन मिटता नहीं है।"
मामले का विवरण: आदेश की अवहेलना और परिणाम
वर्तमान मामले में, अपीलकर्ता ने ट्रायल कोर्ट के समक्ष यह आश्वासन दिया था कि वे विवादित संपत्ति को किसी तीसरे पक्ष को नहीं बेचेंगे। इस आश्वासन के बावजूद, उन्होंने 2007 से 2011 के बीच संपत्ति के हिस्सों को बेच दिया, जो अदालत के आदेश का स्पष्ट उल्लंघन था।
ट्रायल कोर्ट और उच्च न्यायालय के निर्णय
ट्रायल कोर्ट ने ऑर्डर 39 रूल 2ए के तहत दायर आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि प्रतिवादी की ओर से जानबूझकर अवमानना साबित नहीं हुई है। हालांकि, उच्च न्यायालय ने इस निर्णय को पलटते हुए अपीलकर्ताओं को अदालत की अवमानना का दोषी ठहराया और दंडित किया।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय: अवमानना के प्रति जीरो टॉलरेंस
सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय के इस निष्कर्ष को बरकरार रखते हुए कहा कि अपीलकर्ताओं ने जानबूझकर अदालत के आदेश का उल्लंघन किया है। न्यायमूर्ति करोल द्वारा लिखित निर्णय में यह स्पष्ट किया गया कि आदेश के बाद में रद्द होने से पूर्व में की गई अवमानना समाप्त नहीं होती।
दंड में संशोधन: कारावास हटाया, मुआवजा बढ़ाया
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ताओं की तीन महीने की कारावास की सजा को हटाते हुए, मुआवजे की राशि को 10 लाख रुपये से बढ़ाकर 13 लाख रुपये कर दिया, जिस पर 6% साधारण ब्याज भी लागू होगा।
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय न्यायपालिका की गरिमा और आदेशों की पवित्रता को बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह संदेश देता है कि अदालत के आदेशों की अवहेलना किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं की जाएगी, चाहे बाद में आदेश रद्द ही क्यों न हो जाए। यह निर्णय न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता को सुनिश्चित करने में सहायक सिद्ध होगा।