दशकों बाद न्याय: अनुकंपा नियुक्ति पर हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला


के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा  2025-03-08 05:25:35



 

एक दशक से न्याय की आस लगाए बैठे परिवार को आखिरकार राहत मिली है। राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में अनुकंपा नियुक्ति के मामले में महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं, जो न केवल न्याय की दिशा में एक बड़ा कदम है, बल्कि भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक मिसाल भी स्थापित करेगा।

मामले की पृष्ठभूमि:

यह मामला अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (एवीवीएनएल) के एक कर्मचारी के निधन से संबंधित है, जिनके पुत्र ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया था। कर्मचारी का निधन 17 फरवरी 2011 को हुआ था, जिसके बाद उनके पुत्र ने नियुक्ति के लिए आवेदन किया। हालांकि, आवेदन इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि आवेदक के दो से अधिक संतान हैं, जो 24 फरवरी 2011 की अधिसूचना के अनुसार अयोग्यता का कारण था।

अधिसूचना की समयसीमा और विवाद:

आवेदक के अनुसार, उनके पिता की मृत्यु के समय उक्त अधिसूचना लागू नहीं थी, क्योंकि एवीवीएनएल ने इसे 5 सितंबर 2011 को अपनाया था। इसलिए, उन्होंने तर्क दिया कि उनके आवेदन पर उस समय की नीति के अनुसार विचार किया जाना चाहिए था, न कि बाद में लागू की गई अधिसूचना के आधार पर।

सुप्रीम कोर्ट के संदर्भ:

कोर्ट ने इस संदर्भ में एन.सी. संतोष बनाम कर्नाटक राज्य एवं अन्य (2020) मामले का उल्लेख किया, जिसमें यह सिद्धांत स्थापित किया गया था कि अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन पर विचार करते समय उस समय की नीति लागू होती है, जब आवेदन पर विचार किया जा रहा हो। हालांकि, इसके बाद आए मध्य प्रदेश राज्य बनाम अमित श्रीवास (2020) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि ऐसी नीति, जो कर्मचारी की मृत्यु के समय लागू थी, वही नियुक्ति के लिए मान्य होगी, जब तक कि नई नीति को पूर्वव्यापी प्रभाव से लागू न किया गया हो।

कोर्ट का निर्णय:

इन संदर्भों को ध्यान में रखते हुए, राजस्थान हाईकोर्ट ने पाया कि एवीवीएनएल द्वारा 5 सितंबर 2011 को अपनाई गई अधिसूचना को पूर्वव्यापी प्रभाव से लागू नहीं किया गया था। इसलिए, आवेदक के पिता की मृत्यु के समय जो नीति लागू थी, वही उनके आवेदन पर लागू होगी। कोर्ट ने यह भी कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य परिवार को अचानक आई वित्तीय संकट से उबारना होता है, और इस मामले में नियुक्ति से इनकार करना इस उद्देश्य के विपरीत होगा।

न्याय की देरी और परिवार की पीड़ा:

कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि इस मामले में नियुक्ति में देरी से परिवार को अत्यधिक पीड़ा और वित्तीय संकट का सामना करना पड़ा है। एक ओर, परिवार अपने सदस्य की मृत्यु से शोकाकुल था, वहीं दूसरी ओर, विभाग की निष्क्रियता ने उनकी कठिनाइयों को और बढ़ा दिया।

राजस्थान हाईकोर्ट का यह निर्णय न केवल इस परिवार के लिए राहतकारी है, बल्कि यह भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल स्थापित करता है। यह निर्णय यह सुनिश्चित करता है कि अनुकंपा नियुक्ति के मामलों में परिवारों को न्याय समय पर मिले और उन्हें अनावश्यक देरी का सामना न करना पड़े।


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