भ्रष्टाचार मामले में बरी कर्मचारी को सेवा लाभ से वंचित करना अनुचित: हाईकोर्ट
के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा 2025-03-07 17:16:38
क्या होता है जब एक कर्मचारी, जिसे भ्रष्टाचार के आरोप में निलंबित किया गया हो, अदालत से बरी होने के बावजूद अपने पूर्ण सेवा लाभ से वंचित रह जाता है? राजस्थान हाईकोर्ट के हालिया फैसले ने इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर दिया है, जो न केवल संबंधित कर्मचारी के लिए बल्कि समस्त सरकारी सेवा क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण है।
मामले की पृष्ठभूमि:
विभागीय दूरसंचार के एक कर्मचारी को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत फंसाया गया था। जांच और मुकदमे के दौरान, उसे दो बार निलंबित किया गया। हालांकि, अंततः अदालत ने उसे सभी आरोपों से बरी कर दिया, और उसके खिलाफ कोई विभागीय कार्रवाई भी नहीं की गई।
वेतन प्रतिबंध का आदेश:
बरी होने के बावजूद, दूरसंचार विभाग ने आदेश जारी किया कि निलंबन अवधि के दौरान कर्मचारी को केवल निर्वाह भत्ता (सब्सिस्टेंस अलाउंस) ही मिलेगा, पूर्ण वेतन नहीं। इस आदेश के खिलाफ कर्मचारी ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) में याचिका दायर की।
केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण का निर्णय:
CAT ने विभाग के आदेश को रद्द करते हुए निर्देश दिया कि कर्मचारी की निलंबन अवधि को 'कर्तव्य पर उपस्थित' माना जाए और उसे सभी बकाया वेतन और भत्ते प्रदान किए जाएं।
राजस्थान हाईकोर्ट में अपील:
विभाग ने CAT के इस निर्णय के खिलाफ राजस्थान हाईकोर्ट में अपील दायर की। न्यायमूर्ति अवनीश झिंगन और न्यायमूर्ति प्रमिल कुमार माथुर की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की।
हाईकोर्ट का अवलोकन:
अदालत ने माना कि: निलंबन केवल जांच, पूछताछ या आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान एक अस्थायी उपाय है, न कि दंड।
यदि कर्मचारी को आपराधिक मामले में बरी कर दिया जाता है और उसके खिलाफ कोई विभागीय कार्रवाई नहीं होती, तो निलंबन अवधि के दौरान उसे केवल निर्वाह भत्ते तक सीमित रखना अनुचित है।
अदालत का निष्कर्ष:
अदालत ने कहा कि, "ट्रिब्यूनल ने सही निष्कर्ष निकाला कि जब कोई विभागीय कार्रवाई नहीं की गई और आपराधिक मामले में बरी होने के बाद, निलंबन अवधि के दौरान वेतन को निर्वाह भत्ते तक सीमित रखने का कोई औचित्य नहीं है।"
अंतिम निर्णय:
राजस्थान हाईकोर्ट ने विभाग की अपील को खारिज करते हुए CAT के आदेश को बरकरार रखा। इस निर्णय के अनुसार, कर्मचारी की निलंबन अवधि को 'कर्तव्य पर उपस्थित' माना जाएगा, और उसे सभी बकाया वेतन और भत्ते प्रदान किए जाएंगे।
न्याय का महत्व:
यह फैसला सरकारी कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह सुनिश्चित करता है कि बिना विभागीय कार्रवाई के, केवल आपराधिक आरोपों के आधार पर, कर्मचारियों को उनके सेवा लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।
राजस्थान हाईकोर्ट का यह निर्णय न्याय की मूलभूत सिद्धांतों की पुनर्स्थापना करता है और सुनिश्चित करता है कि बिना उचित प्रक्रिया के किसी भी कर्मचारी को उसके अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।