विवाहित पुत्रियों के अधिकारों की जीत: राजस्थान हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला


के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा  2025-03-07 08:31:46



 

क्या विवाहित पुत्री अपने दिवंगत पिता की अनुकंपा नियुक्ति की हकदार हो सकती है? राजस्थान हाईकोर्ट ने इस प्रश्न का उत्तर देते हुए एक ऐसा फैसला सुनाया है, जो न केवल न्याय की नई मिसाल कायम करता है, बल्कि समाज में लैंगिक समानता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम भी है।

मामले की पृष्ठभूमि:

उत्तर पश्चिम रेलवे के एक स्थायी कर्मचारी के निधन के बाद, उनकी विवाहित पुत्री, जो परिवार की एकमात्र जीवित सदस्य थीं, ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया। हालांकि, राज्य सरकार ने उनके आवेदन को इस आधार पर अस्वीकार कर दिया कि वह विवाहित हैं और उनके पति कार्यरत हैं। इस अस्वीकृति के खिलाफ उन्होंने कैट में याचिका दायर की।

कैट का निर्णय:

कैट ने इस मामले में राजस्थान हाईकोर्ट के पूर्ण पीठ द्वारा दिए गए 'हीना शेख बनाम राजस्थान राज्य' के फैसले का संदर्भ लेते हुए कहा कि विवाहित पुत्री को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित करना असंवैधानिक है। कैट ने मामले को संबंधित विभाग को पुनर्विचार के लिए भेजा और याचिकाकर्ता को मेरिट के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति प्रदान करने का निर्देश दिया।

राज्य सरकार की आपत्ति:

राज्य सरकार ने कैट के इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी, यह तर्क देते हुए कि याचिकाकर्ता विवाहित है और उसके पति कार्यरत हैं, इसलिए वह अनुकंपा नियुक्ति की पात्र नहीं है।

हाईकोर्ट का अवलोकन:

हाईकोर्ट ने पाया कि राज्य सरकार का आदेश एक 'नॉन-स्पीकिंग ऑर्डर' था, जिसमें अस्वीकृति के स्पष्ट कारण नहीं बताए गए थे। कोर्ट ने कहा कि ऐसे आदेश, जो नागरिकों के अधिकारों को प्रभावित करते हैं, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं।

न्यायालय का निष्कर्ष:

न्यायालय ने कैट के आदेश को सही ठहराते हुए राज्य सरकार की याचिका खारिज कर दी। इस निर्णय से यह स्पष्ट होता है कि विवाहित पुत्रियों को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है।

अन्य न्यायिक दृष्टांत:

यह उल्लेखनीय है कि उड़ीसा हाईकोर्ट ने भी अपने एक फैसले में कहा है कि सेवा के दौरान पिता की मृत्यु के बाद विवाहित पुत्रियों को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16(2) का उल्लंघन है। 

समाज पर प्रभाव:

इस फैसले का व्यापक प्रभाव होगा, क्योंकि यह लैंगिक समानता को प्रोत्साहित करता है और समाज में महिलाओं की स्थिति को सशक्त बनाता है। यह निर्णय न केवल न्याय की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक सुधार की दिशा में भी एक बड़ा कदम है।

राजस्थान हाईकोर्ट का यह निर्णय समाज में व्याप्त लैंगिक भेदभाव को समाप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह फैसला यह संदेश देता है कि कानून के समक्ष सभी समान हैं, चाहे वे विवाहित हों या अविवाहित।


global news ADglobal news AD