सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय: मियां-तियां और पाकिस्तानी कहने पर नहीं होगी सजा
के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा 2025-03-06 16:11:50

सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति को 'मियां-तियां' या 'पाकिस्तानी' कहने मात्र से धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का अपराध सिद्ध नहीं होता। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को 'मियां-तियां' या 'पाकिस्तानी' कहना भले ही अनुचित हो, लेकिन यह भारतीय दंड संहिता की धारा 298 के तहत धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला अपराध नहीं माना जा सकता। यह निर्णय न्याय की नई परिभाषा प्रस्तुत करता है, जहां शब्दों के उपयोग और उनके प्रभाव के बीच संतुलन स्थापित किया गया है।
मामले की पृष्ठभूमि: आरोप और घटनाक्रम
यह मामला झारखंड के बोकारो जिले का है, जहां 80 वर्षीय हरि नंदन सिंह ने सूचना के अधिकार के तहत अतिरिक्त कलेक्टर से जानकारी मांगी थी। सूचना से असंतुष्ट होकर उन्होंने अपील दायर की। नवंबर 2020 में, जब अनुवादक और आरटीआई क्लर्क जानकारी देने आए, तो सिंह ने कथित रूप से उनके धर्म का उल्लेख करते हुए 'मियां-तियां' और 'पाकिस्तानी' शब्दों का उपयोग किया। इसके बाद, सरकारी कर्मचारी ने सिंह पर सरकारी कार्य में बाधा डालने और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आरोप लगाते हुए प्राथमिकी दर्ज कराई।
न्यायालयीन प्रक्रिया: निचली अदालत से उच्चतम न्यायालय तक
जांच के बाद, पुलिस ने सिंह के खिलाफ आईपीसी की धारा 298, 504, 506, 353 और 323 के तहत आरोप पत्र दाखिल किया। न्यायिक मजिस्ट्रेट ने आरोपों को स्वीकार करते हुए समन जारी किया। सिंह ने आरोपमुक्ति की याचिका दायर की, जिसे मजिस्ट्रेट ने खारिज कर दिया। इसके बाद, उन्होंने उच्च न्यायालय में अपील की, लेकिन वहां भी राहत नहीं मिली। अंततः, सिंह ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय: शब्दों की सीमाएं और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि 'मियां-तियां' और 'पाकिस्तानी' जैसे शब्दों का उपयोग भले ही अनुचित हो, लेकिन यह धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का अपराध नहीं है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे शब्दों का उपयोग 'poor taste' में है, लेकिन इसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
धारा 298 का विश्लेषण: अपराध की परिभाषा और सीमाएं
भारतीय दंड संहिता की धारा 298 के तहत, किसी व्यक्ति द्वारा जानबूझकर ऐसे शब्दों का उच्चारण करना, जिससे किसी अन्य व्यक्ति की धार्मिक भावनाएं आहत हों, अपराध माना जाता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस मामले में उपयोग किए गए शब्द इस परिभाषा के अंतर्गत नहीं आते, क्योंकि उनका उद्देश्य धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं था।
न्याय की दिशा में एक कदम: आरोपमुक्ति का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने सभी तथ्यों और परिस्थितियों का मूल्यांकन करते हुए हरि नंदन सिंह को सभी आरोपों से बरी कर दिया। यह निर्णय न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक सहिष्णुता के बीच संतुलन स्थापित करता है।
न्यायपालिका की भूमिका और समाज में संदेश
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय समाज में सहिष्णुता और समझ की भावना को प्रोत्साहित करता है। यह स्पष्ट करता है कि भले ही कुछ शब्द असभ्य या अनुचित हों, लेकिन उन्हें अपराध की श्रेणी में रखना न्यायसंगत नहीं है। यह न्यायपालिका की परिपक्वता और संवेदनशीलता को दर्शाता है, जो समाज में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक सहिष्णुता के बीच संतुलन स्थापित करने में सहायक है।