लास्ट सीन थ्योरी पर आधारित दोषसिद्धि अस्वीकार: सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय
के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा 2025-03-06 13:42:00

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक चार वर्षीय बच्ची के साथ बलात्कार और हत्या के आरोप में दोषी ठहराए गए व्यक्ति की फांसी की सजा और दोषसिद्धि को निरस्त कर दिया है। यह निर्णय न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की तीन-न्यायाधीशों की पीठ द्वारा लिया गया। आरोपी ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी, जिसमें उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 302 और 376(2)(G) के तहत दोषी ठहराया गया था और मृत्युदंड की सजा सुनाई गई थी।
न्याय की नई परिभाषा
यह मामला न्यायिक प्रणाली में साक्ष्यों के महत्व और दोषसिद्धि के मानकों पर एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रकरण में 'लास्ट सीन थ्योरी' के आधार पर दोषसिद्धि को अस्वीकार करते हुए न्याय की एक नई मिसाल कायम की है।
मामले की पृष्ठभूमि
वर्ष 2004 में, अभियुक्त ने शिकायतकर्ता की चार वर्षीय बेटी और उसकी पितृ पक्ष की चाची के साथ एक विवाह समारोह में भाग लिया था। यह समारोह सात संयुक्त विवाहों का हिस्सा था जो एक ही हॉल में आयोजित किए गए थे। कुछ समय बाद, अभियुक्त ने चाची को सूचित किया कि वह पीड़िता को घर ले जा रहा है। हालांकि, पीड़िता घर नहीं पहुंची, और पूछताछ करने पर अभियुक्त ने बताया कि उसने उसे विवाह हॉल में ही छोड़ दिया था। बाद में, पूछताछ के दौरान, अभियुक्त ने कथित रूप से बलात्कार और हत्या करने के बाद पीड़िता के शव को गन्ने के खेत में छोड़ने की बात कबूल की। शव की खोज के बाद, शिकायतकर्ता ने प्राथमिकी दर्ज कराई। इसके बाद, ट्रायल कोर्ट ने अपने निर्णय में अभियुक्त को आईपीसी की धारा 376, 302 और 201 के तहत दोषी ठहराया। अभियुक्त ने इस फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील दायर की, लेकिन उच्च न्यायालय ने उसकी दोषसिद्धि और मृत्युदंड की सजा की पुष्टि की। इसके परिणामस्वरूप, अभियुक्त ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।
सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण
सुप्रीम कोर्ट ने मामले के तथ्यों और परिस्थितियों का मूल्यांकन करते हुए पाया कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य अभियुक्त की दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं थे। कोर्ट ने उल्लेख किया कि 'लास्ट सीन थ्योरी' के आधार पर केवल दोषसिद्धि नहीं की जा सकती है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने कहा, "केवल 'लास्ट सीन थ्योरी' के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती है। दोषसिद्धि तभी संभव है जब अपराध संदेह से परे सिद्ध हो।"
गवाहों की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह
कोर्ट ने गवाहों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाया। स्वतंत्र गवाह PW7 ने अपनी जिरह में स्वीकार किया कि उसने पहले मौके पर जांच अधिकारी PW8 को यह नहीं बताया था कि उसने अभियुक्त को मृतका के साथ विवाह हॉल से जाते हुए देखा था। इस महत्वपूर्ण जानकारी को पहले न बताने का कारण अस्पष्ट रहा, जिससे गवाह की विश्वसनीयता पर संदेह उत्पन्न हुआ।
दोषसिद्धि के लिए अपर्याप्त साक्ष्य
कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत परिस्थितिजन्य साक्ष्य अभियुक्त की दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं थे। कोर्ट ने कहा, "हालांकि यह अपराध मानवता के खिलाफ है, लेकिन अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य स्पष्ट और अचूक नहीं हैं, जो केवल अभियुक्त की ओर इशारा करते हैं।"
न्याय की पुनर्स्थापना
इन सभी विचारों के आधार पर, सुप्रीम कोर्ट ने अभियुक्त की दोषसिद्धि और मृत्युदंड की सजा को निरस्त कर दिया, जिससे न्याय की पुनर्स्थापना हुई। यह निर्णय न्यायिक प्रणाली में साक्ष्यों के महत्व और दोषसिद्धि के मानकों पर एक महत्वपूर्ण संदेश देता है।