430 करोड़ खर्च के बाद भी कुपोषण में वृद्धि: उत्तराखंड के बच्चों का भविष्य अधर में


के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा  2025-03-05 05:49:31



 

उत्तराखंड में कुपोषण की बढ़ती समस्या ने राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं और सरकारी योजनाओं की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। हाल ही में जारी आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 की रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश में अति कुपोषित बच्चों की संख्या में ढाई गुना वृद्धि हुई है, जो एक गंभीर चिंता का विषय है।

कुपोषण की वर्तमान स्थिति:

आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के अनुसार, वर्ष 2020-21 में उत्तराखंड में कुपोषित बच्चों की संख्या 8,856 थी, जबकि अति कुपोषित बच्चों की संख्या 1,129 थी। हालांकि, 2024-25 में अति कुपोषित बच्चों की संख्या बढ़कर 2,983 हो गई है। यह वृद्धि दर्शाती है कि राज्य में कुपोषण की समस्या गंभीर होती जा रही है।

सरकारी प्रयास और योजनाएं:

केंद्र और राज्य सरकार ने कुपोषण को खत्म करने और महिलाओं के स्वास्थ्य में सुधार के लिए कई योजनाएं चलाई हैं। चालू वित्तीय वर्ष में दिसंबर माह तक इन योजनाओं पर 430 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा आंगनबाड़ी केंद्रों में पोषाहार और टेक होम राशन जैसी सुविधाएं प्रदान की जा रही हैं। स्वास्थ्य विभाग राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत बच्चों का स्वास्थ्य परीक्षण और गंभीर बीमारियों के लिए मुफ्त इलाज की सुविधा भी दे रहा है।

कुपोषण के प्रभाव:

विशेषज्ञों के अनुसार, कुपोषण के कारण बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास रुक जाता है। पोषक तत्वों की कमी से उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर हो जाती है, जिससे वे विभिन्न बीमारियों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं। यह न केवल उनके वर्तमान स्वास्थ्य को प्रभावित करता है, बल्कि उनके भविष्य पर भी नकारात्मक प्रभाव डालता है।

विशेषज्ञों की राय:

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की मिशन निदेशक स्वाति भदौरिया ने कहा है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के माध्यम से आंगनबाड़ी केंद्रों में जाकर बच्चों के स्वास्थ्य की जांच की जाती है। यदि किसी बच्चे में कुपोषण के कारण कोई गंभीर समस्या है, तो उसका निशुल्क इलाज कराया जाता है।

अन्य राज्यों की स्थिति:

कुपोषण की समस्या केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं है। कौशांबी जिले में 1,78,624 बच्चों में से 17,656 कुपोषित और 6,018 अति कुपोषित पाए गए हैं। बिलासपुर में भी कुपोषित बच्चों की संख्या में वृद्धि देखी गई है, जिससे जिला कुपोषण केंद्र में बच्चों की संख्या बढ़ने से अब दूसरों के लिए जगह कम पड़ रही है। 

उत्तराखंड में कुपोषण की बढ़ती समस्या सरकार और समाज दोनों के लिए एक गंभीर चुनौती है। 430 करोड़ रुपये खर्च करने के बावजूद अति कुपोषित बच्चों की संख्या में वृद्धि यह संकेत देती है कि वर्तमान योजनाओं में सुधार की आवश्यकता है। समाज के सभी वर्गों को मिलकर इस समस्या का समाधान ढूंढना होगा, ताकि बच्चों का स्वस्थ भविष्य सुनिश्चित किया जा सके।


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