सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय: बरी हुए आरोपियों की गिरफ्तारी पर जमानत होगी प्राथमिकता


के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा  2025-03-04 17:56:52



 

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि जब कोई अपीलीय न्यायालय दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 390 के तहत किसी आरोपी की गिरफ्तारी का आदेश देता है, तो जमानत देना सामान्य नियम होना चाहिए। यह निर्णय न्यायमूर्ति अभय एस. ओका और न्यायमूर्ति उज्जल भुयान की पीठ ने सुनाया, जिसमें उन्होंने कहा कि बरी होने का आदेश आरोपी की निर्दोषता की धारणा को और मजबूत करता है। इसलिए, धारा 390 के तहत आदेश पारित करते समय, आरोपी को जेल भेजने के बजाय उसे जमानत पर रिहा करना चाहिए। 

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला सिख नेता सुदर्शन सिंह वज़ीर से संबंधित है, जो 2021 में जम्मू-कश्मीर के पूर्व विधान परिषद सदस्य त्रिलोचन सिंह वज़ीर की हत्या के मामले में आरोपी थे। सुदर्शन सिंह वज़ीर, जो जम्मू-कश्मीर राज्य गुरुद्वारा प्रबंधक बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष भी हैं, को अक्टूबर 2023 में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने सभी आरोपों से मुक्त कर दिया था, क्योंकि उनके खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं थे। डिस्चार्ज के बाद उन्हें ₹25,000 के निजी बॉन्ड और समान राशि की जमानत पर रिहा कर दिया गया था। 

दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश और सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया

दिल्ली सरकार ने इस डिस्चार्ज आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की। 21 अक्टूबर 2023 को, हाईकोर्ट ने वज़ीर को सुने बिना डिस्चार्ज आदेश पर एकतरफा रोक (एक्स-पार्टी स्टे) लगा दी। बाद में, 4 नवंबर 2024 को, हाईकोर्ट ने वज़ीर को आत्मसमर्पण (सरेंडर) करने और न्यायिक हिरासत में जाने का निर्देश दिया, यह कहते हुए कि डिस्चार्ज आदेश पर लगी रोक का मतलब है कि वे कानूनी रूप से अब भी आरोपी हैं। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस आदेश को निरस्त करते हुए कहा कि डिस्चार्ज आदेश पर रोक लगाना एक कठोर कदम है, जिससे बिना किसी कानूनी समीक्षा के आरोपी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही फिर से शुरू हो जाती है। 

सीआरपीसी की धारा 390 का दायरा और जमानत का सिद्धांत

सुप्रीम कोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 390 की व्याख्या करते हुए कहा कि यह धारा मुख्य रूप से अपील के दौरान बरी हुए व्यक्ति को न्यायालय में उपस्थित कराने के लिए लागू होती है। हालांकि, यदि इसे किसी डिस्चार्ज मामले में लागू किया जाता है, तो इसे सावधानीपूर्वक उपयोग किया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि 'जमानत नियम है, जेल अपवाद' का सिद्धांत यहां भी लागू होता है। इसलिए, यदि कोई आरोपी बरी हो चुका है और उसके खिलाफ अपील लंबित है, तो उसे जेल में रखने के बजाय जमानत पर रिहा करना चाहिए। 

हाईकोर्ट की पुनरीक्षण शक्ति और डिस्चार्ज आदेश पर रोक

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट को सीआरपीसी की धारा 397 के तहत पुनरीक्षण (रिविजन) की शक्ति तो है, लेकिन यह केवल 'अत्यंत दुर्लभ और असाधारण मामलों' में ही किया जाना चाहिए, जब डिस्चार्ज आदेश स्पष्ट रूप से अन्यायपूर्ण (एक्स-फेशी पेरवर्स) हो। इसके अलावा, अदालत ने कहा कि डिस्चार्ज आदेश से मुक्त हुआ व्यक्ति, एक बरी हुए व्यक्ति की तुलना में भी मजबूत कानूनी स्थिति में होता है। इसलिए, हाईकोर्ट को डिस्चार्ज आदेश पर रोक लगाने से पहले आरोपी को सुनवाई का अवसर देना चाहिए। 

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के 21 अक्टूबर 2023 और 4 नवंबर 2024 के आदेशों को रद्द कर दिया। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल डिस्चार्ज आदेश पर रोक लगने से आरोपी को जेल नहीं भेजा जा सकता। हालांकि, सावधानी के तौर पर, कोर्ट ने वज़ीर को चार सप्ताह के भीतर सत्र न्यायालय में नई जमानत जमा करने का निर्देश दिया। इसके अलावा, हाईकोर्ट को निर्देश दिया गया कि वह पुनरीक्षण याचिका का जल्द से जल्द निपटारा करे। यदि वज़ीर जानबूझकर सुनवाई में देरी करते हैं, तो हाईकोर्ट उनकी जमानत रद्द करने पर विचार कर सकता है। 

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय न्यायिक प्रक्रिया में आरोपी के अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह न केवल बरी हुए आरोपियों की गिरफ्तारी के मामलों में जमानत को प्राथमिकता देता है, बल्कि हाईकोर्ट की पुनरीक्षण शक्तियों के उपयोग में भी संतुलन स्थापित करता है। इससे न्यायिक प्रणाली में निष्पक्षता और न्याय की अवधारणा को और मजबूती मिलेगी।


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