फरार घोषित आरोपी भी मांग सकता है अग्रिम जमानत! हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा 2025-03-04 16:53:24

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की जबलपुर पीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि आरोप-पत्र में आरोपी को फरार घोषित किया गया है, तब भी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार्य है। यह निर्णय न्यायमूर्ति सुरेश कुमार कैत और न्यायमूर्ति विवेक जैन की खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश द्वारा संदर्भित प्रश्न का उत्तर देते हुए दिया।
न्याय की नई दिशा
आरोपियों के अधिकारों और न्यायिक प्रक्रियाओं के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का यह निर्णय एक महत्वपूर्ण कदम है। यह निर्णय न्यायिक प्रणाली में अभियुक्तों के अधिकारों की सुरक्षा और न्याय के सिद्धांतों की पुनर्स्थापना की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता पर भारतीय दंड संहिता की धारा 420 (धोखाधड़ी), 406 (आपराधिक विश्वासघात) और 409 (लोक सेवक, बैंकर, व्यापारी या एजेंट द्वारा आपराधिक विश्वासघात) के तहत आरोप लगाए गए थे। जांच के बाद, संबंधित न्यायालय में आरोप-पत्र दायर किया गया, जिसमें उन्हें फरार घोषित किया गया था। इसके पश्चात, धारा 82 और 83 के तहत कार्यवाही शुरू की गई और याचिकाकर्ता को उद्घोषित अपराधी घोषित किया गया। उन्होंने अग्रिम जमानत के लिए निचली अदालत में याचिका दायर की, जो खारिज कर दी गई, जिसके बाद उन्होंने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।
विधिक प्रश्न और न्यायालय का दृष्टिकोण
खंडपीठ ने निम्नलिखित प्रश्नों पर विचार किया:
क्या धारा 82 और 83 या धारा 299 के तहत कार्यवाही शुरू होने पर धारा 438 के तहत अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार्य है?
क्या आरोपी को उद्घोषित अपराधी घोषित किए जाने पर अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार्य है?
खंडपीठ ने विभिन्न न्यायिक निर्णयों का संदर्भ लेते हुए निष्कर्ष निकाला कि इन परिस्थितियों में भी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार्य है। हालांकि, ऐसे मामलों में अग्रिम जमानत प्रदान करने में अपराध की गंभीरता और प्रकृति को ध्यान में रखना आवश्यक है।
न्यायालय का निर्णय
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि अग्रिम जमानत के प्रावधान असाधारण शक्तियां हैं, जिन्हें उचित मामलों में ही लागू किया जाना चाहिए। यदि यह माना जाए कि ऐसे मामलों में अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार्य नहीं है, तो यह न्यायालय की शक्तियों में कटौती होगी। इसलिए, न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि धारा 82/83 और 299 के तहत कार्यवाही शुरू होने या आरोपी को उद्घोषित अपराधी घोषित किए जाने पर भी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार्य है। हालांकि, ऐसे मामलों में अग्रिम जमानत प्रदान करने में अपराध की गंभीरता और प्रकृति को ध्यान में रखना आवश्यक है।
न्यायालय की टिप्पणी
खंडपीठ ने यह भी टिप्पणी की कि अग्रिम जमानत प्रदान करते समय न्यायालय को अत्यंत सावधानी बरतनी चाहिए। यह शक्ति केवल अत्यंत और असाधारण मामलों में ही न्याय के हित में प्रयोग की जानी चाहिए।
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का यह निर्णय न्यायिक प्रणाली में अभियुक्तों के अधिकारों की सुरक्षा और न्याय के सिद्धांतों की पुनर्स्थापना की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है। यह निर्णय न्यायिक प्रक्रियाओं में संतुलन स्थापित करने और न्याय के मूल सिद्धांतों की रक्षा करने में सहायक सिद्ध होगा।