राजस्थान उच्च न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय: अब छोटी गलतियों का नहीं रहेगा जीवनभर का दाग
के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा 2025-03-04 16:14:11

क्या एक छोटी सी गलती का बोझ किसी युवा के पूरे जीवन पर पड़ना चाहिए? राजस्थान उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय में इस प्रश्न का उत्तर देते हुए युवाओं के भविष्य को नया मार्ग दिखाया है।
किशोर न्याय प्रणाली में सुधार की आवश्यकता
राजस्थान उच्च न्यायालय की जोधपुर पीठ ने किशोर न्याय प्रणाली में एक ऐसी व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया है, जिससे युवाओं द्वारा किए गए छोटे-मोटे अपराधों के रिकॉर्ड मिटाए जा सकें। इससे उनके पुनर्वास में आसानी होगी और उनकी व्यक्तिगत एवं पेशेवर वृद्धि में 'युवावस्था की गलतियों' के कारण बाधा नहीं आएगी।
दंडात्मक दृष्टिकोण के दुष्प्रभाव
न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि एक दंडात्मक दृष्टिकोण से युवाओं को स्थायी रूप से अपराधी के रूप में चिह्नित किया जा सकता है, जो उनके भविष्य के लिए हानिकारक हो सकता है। न्यायमूर्ति अरुण मोंगा ने अपने आदेश में कहा, "युवाओं को सुधारात्मक दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है, क्योंकि वे भावनात्मक और बौद्धिक विकास की प्रक्रिया में होते हैं और इस अवस्था में अक्सर आवेगपूर्ण कार्य करते हैं।"
एफआईआर का पंजीकरण और नागरिक अधिकार
न्यायालय ने यह भी दोहराया कि केवल एफआईआर का पंजीकरण किसी नागरिक को दोषी या खराब चरित्र वाला नहीं बनाता। यह टिप्पणी एक उम्मीदवार की याचिका पर की गई, जिसे पुलिस में नियुक्ति से वंचित कर दिया गया था, क्योंकि उसके खिलाफ किशोरावस्था में एक आपराधिक मामला दर्ज था, हालांकि वह बरी हो चुका था।
'भूल जाने का अधिकार' की पूर्णता
उल्लेखनीय है कि एक अन्य मामले में, उच्च न्यायालय की जयपुर पीठ ने इसी प्रकार की राय व्यक्त करते हुए कहा था कि किशोर अपराध के रिकॉर्ड नष्ट करके 'भूल जाने का अधिकार' एक पूर्ण अधिकार है और राज्य को इसे पूर्ण अर्थ देना होगा।
न्यायालय का दृष्टिकोण: सुधारात्मक और संवेदनशील
न्यायमूर्ति मोंगा ने अपने आदेश में कहा, "युवाओं को सुधारात्मक दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है, क्योंकि वे भावनात्मक और बौद्धिक विकास की प्रक्रिया में होते हैं और इस अवस्था में अक्सर आवेगपूर्ण कार्य करते हैं।" उन्होंने आगे कहा कि दंडात्मक दृष्टिकोण जो युवाओं को स्थायी रूप से अपराधी के रूप में चिह्नित करता है, न्याय के सिद्धांतों, पुनर्वास और समाज में पुन: एकीकरण के खिलाफ है।
किशोर न्याय अधिनियम के प्रावधान
न्यायालय ने किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा कि इस अधिनियम के तहत किसी बच्चे को दोषसिद्धि के आधार पर अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता। इसलिए, एक ऐसी व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए जिससे युवाओं के छोटे-मोटे अपराधों के रिकॉर्ड मिटाए जा सकें, ताकि उनके पुनर्वास में आसानी हो और उनकी व्यक्तिगत एवं पेशेवर वृद्धि में बाधा न आए।
याचिकाकर्ता का मामला और न्यायालय का निर्णय
यह याचिका एक सफल उम्मीदवार द्वारा दायर की गई थी, जिसे सब-इंस्पेक्टर/प्लाटून कमांडर के पद पर नियुक्ति नहीं दी गई थी, क्योंकि उसके खिलाफ किशोरावस्था में आपराधिक मामले दर्ज थे, जिनमें वह संदेह का लाभ देकर बरी हुआ था। राज्य ने तर्क दिया कि उम्मीदवार का चरित्र इस पद के लिए उपयुक्त नहीं है, जबकि याचिकाकर्ता ने कहा कि बरी होना बरी होना होता है, चाहे वह संदेह के लाभ के आधार पर हो या समझौते के माध्यम से। न्यायालय ने याचिकाकर्ता के पक्ष में निर्णय देते हुए राज्य को निर्देश दिया कि यदि चयन प्रक्रिया में वह अन्यथा योग्य पाया जाता है, तो उसे सेवा में शामिल किया जाए।
राजस्थान उच्च न्यायालय का यह निर्णय युवाओं के भविष्य को सुरक्षित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह निर्णय न केवल न्याय के सिद्धांतों को सुदृढ़ करता है, बल्कि समाज में सुधारात्मक दृष्टिकोण को भी प्रोत्साहित करता है, जिससे युवाओं को अपनी गलतियों से सीखकर एक नया जीवन शुरू करने का अवसर मिलता है।