संवैधानिक अनुच्छेद 226 के तहत निजी स्कूलों की जवाबदेही: दिल्ली हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला


के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा  2025-03-04 10:29:52



 

शिक्षा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण मोड़ पर, दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक ऐसा निर्णय दिया है जो निजी अनुदानहीन स्कूलों और उनके कर्मचारियों के बीच संबंधों को नए सिरे से परिभाषित करता है। यह फैसला न केवल शिक्षकों के अधिकारों की रक्षा करता है, बल्कि शिक्षा प्रणाली में न्याय और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

पृष्ठभूमि: शिक्षक की नियुक्ति और सेवा शर्तें

यह मामला एक रसायन विज्ञान की पोस्ट-ग्रेजुएट शिक्षिका से संबंधित है, जिन्हें 20 जुलाई 1998 को एक निजी अनुदानहीन स्कूल में नियुक्त किया गया था। उनकी नियुक्ति पत्र में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया था कि उनकी सेवा शर्तें दिल्ली स्कूल शिक्षा अधिनियम और नियम, 1973 (DSEAR) द्वारा संचालित होंगी।

सेवा निवृत्ति और पुनर्नियुक्ति का विवाद

DSEAR के नियम 110(2) के अनुसार, प्रत्येक शिक्षक 60 वर्ष की आयु तक पद पर बने रहेंगे, और यदि वे 1 नवंबर के बाद इस आयु को प्राप्त करते हैं, तो उन्हें अगले वर्ष 30 अप्रैल तक पुनर्नियुक्ति दी जाएगी। शिक्षिका ने 30 नवंबर 2024 को 60 वर्ष की आयु पूरी की और पुनर्नियुक्ति के लिए आवेदन किया, लेकिन स्कूल ने इसे अस्वीकार कर दिया।

न्यायालय में याचिका: संवैधानिक अनुच्छेद 226 के तहत रिट

स्कूल के निर्णय से असंतुष्ट होकर, शिक्षिका ने अनुच्छेद 226 के तहत दिल्ली उच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर की, जिसमें उन्होंने पुनर्नियुक्ति की मांग की। स्कूल ने तर्क दिया कि निजी अनुदानहीन स्कूलों के सेवा मामलों में रिट न्यायालय का अधिकार क्षेत्र नहीं होता।

न्यायालय का दृष्टिकोण: स्टे. मैरी एजुकेशन सोसाइटी मामला

न्यायालय ने स्टे. मैरी एजुकेशन सोसाइटी बनाम राजेंद्र प्रसाद भार्गव मामले का संदर्भ दिया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यदि सेवा शर्तें सांविधिक प्रावधानों द्वारा नियंत्रित हैं, तो रिट याचिका स्वीकार्य है। इसलिए, न्यायालय ने पाया कि इस मामले में रिट याचिका स्वीकार्य है।

न्यायालय का निर्णय: शिक्षिका के पक्ष में फैसला

न्यायालय ने पाया कि शिक्षिका DSEAR के नियम 110(2) के तहत पुनर्नियुक्ति की हकदार हैं। न्यायालय ने स्कूल को निर्देश दिया कि उन्हें 30 अप्रैल 2025 तक पुनर्नियुक्ति दी जाए और 1 दिसंबर 2024 से सभी संबंधित लाभ प्रदान किए जाएं। इसके अलावा, न्यायालय ने स्कूल पर ₹25,000 का जुर्माना भी लगाया।

शिक्षा क्षेत्र में न्याय की स्थापना

यह निर्णय शिक्षा क्षेत्र में न्याय और पारदर्शिता की स्थापना की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह न केवल शिक्षकों के अधिकारों की रक्षा करता है, बल्कि निजी स्कूलों की जवाबदेही भी सुनिश्चित करता है। यह फैसला शिक्षा प्रणाली में संतुलन और न्याय की आवश्यकता को रेखांकित करता है, जो समाज के समग्र विकास के लिए अनिवार्य है।


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