मद्रास उच्च न्यायालय का क्रांतिकारी फैसला: नशे में ड्राइविंग पर भी देना होगा मुआवजा
के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा 2025-03-04 09:13:15

क्या बीमा कंपनियां नशे में वाहन चलाने वाले ड्राइवरों के कारण होने वाली दुर्घटनाओं में मुआवजा देने से बच सकती हैं? मद्रास उच्च न्यायालय के हालिया फैसले ने इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर दिया है, जो बीमा उद्योग और आम जनता दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।
पृष्ठभूमि: दुर्घटना और दावा
30 दिसंबर 2017 को चेन्नई के थिरुनीरमलाई मेन रोड पर राजसेकरन नामक व्यक्ति, जो सड़क के किनारे पैदल चल रहे थे, एक तेज़ गति से आ रही वैन की चपेट में आ गए। इस दुर्घटना में उनकी मौके पर ही मृत्यु हो गई। मृतक के परिवार ने 65 लाख रुपये के मुआवजे की मांग करते हुए मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) में याचिका दायर की। अधिकरण ने 27,65,300 रुपये मुआवजा प्रदान किया, लेकिन बीमा कंपनी को यह कहते हुए मुक्त कर दिया कि ड्राइवर नशे में था।
अपील: उच्च न्यायालय की शरण में
इस निर्णय से असंतुष्ट होकर, मृतक के परिवार ने मद्रास उच्च न्यायालय में अपील दायर की। उन्होंने केरल उच्च न्यायालय के एक पूर्व निर्णय का हवाला देते हुए तर्क दिया कि बीमा कंपनी मुआवजा देने से बच नहीं सकती, भले ही ड्राइवर नशे में हो।
न्यायालय का अवलोकन
न्यायमूर्ति एम. धांडापानी ने केरल उच्च न्यायालय के मामले 'मुहम्मद राशिद @ राशिद बनाम गिरिवासन ई.के.' का संदर्भ देते हुए कहा कि बीमा पॉलिसी में यदि यह शर्त भी हो कि नशे की हालत में वाहन चलाना पॉलिसी के नियमों का उल्लंघन है, तब भी बीमा कंपनी मुआवजा देने से बच नहीं सकती। न्यायालय ने यह भी कहा कि बीमा कंपनी मुआवजा देने के बाद वाहन मालिक से राशि वसूल सकती है।
मुआवजे की राशि में वृद्धि
न्यायालय ने पाया कि मृतक की आय का अनुमान कम लगाया गया था। न्यायालय ने मासिक आय को 15,000 रुपये मानते हुए, मुआवजे की राशि को बढ़ाकर 30,25,000 रुपये कर दिया, जिस पर 7.5% वार्षिक ब्याज भी लागू होगा।
बीमा कंपनी की जिम्मेदारी
न्यायालय ने बीमा कंपनी को निर्देश दिया कि वह छह सप्ताह के भीतर बढ़ी हुई मुआवजा राशि जमा करे। इसके बाद, बीमा कंपनी इस राशि को वाहन मालिक से वसूलने के लिए स्वतंत्र होगी।
यह निर्णय न केवल पीड़ित परिवारों के लिए राहत प्रदान करता है, बल्कि बीमा कंपनियों को भी यह संदेश देता है कि वे पॉलिसी की शर्तों का हवाला देकर मुआवजा देने से बच नहीं सकतीं। यह न्यायालय का कदम न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।