जबरदस्त सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: व्यावसायिक ऋण को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम से किया बाहर
के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा 2025-03-03 21:14:29

क्या आप जानते हैं कि यदि आपने अपने व्यवसाय के विस्तार या लाभ कमाने के उद्देश्य से बैंक से ऋण लिया है, तो आप उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत 'उपभोक्ता' नहीं माने जाएंगे? सुप्रीम कोर्ट के एक हालिया निर्णय ने इस मुद्दे पर महत्वपूर्ण प्रकाश डाला है, जो व्यावसायिक ऋण लेने वालों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है।
मामले की पृष्ठभूमि:
2014 में, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया ने एड ब्यूरो एडवरटाइजिंग प्राइवेट लिमिटेड को रजनीकांत की फिल्म 'कोचादयान' के पोस्ट-प्रोडक्शन के लिए ₹10 करोड़ का ऋण प्रदान किया। यह ऋण अनियमित हो गया, जिससे ऋण वसूली अधिकरण (DRT) में मामला दर्ज हुआ। बाद में, ₹3.56 करोड़ के एकमुश्त समझौते (OTS) के तहत मामला सुलझाया गया। एड ब्यूरो ने दावा किया कि OTS के अनुसार भुगतान करने के बावजूद, बैंक ने उसे क्रेडिट इंफॉर्मेशन ब्यूरो ऑफ इंडिया लिमिटेड (CIBIL) में डिफॉल्टर के रूप में रिपोर्ट किया, जिससे उसकी प्रतिष्ठा और व्यवसाय को नुकसान हुआ। इस आधार पर, एड ब्यूरो ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) में बैंक के खिलाफ शिकायत दर्ज की।
NCDRC का निर्णय:
NCDRC ने बैंक की सेवा में कमी मानते हुए, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया को एड ब्यूरो को ₹75 लाख का मुआवजा और मुकदमेबाजी की लागत का भुगतान करने का आदेश दिया। बैंक ने इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
सुप्रीम कोर्ट का अवलोकन:
जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने पाया कि ऋण का प्रमुख उद्देश्य लाभ कमाना था, जो इसे व्यावसायिक उद्देश्य बनाता है। कोर्ट ने कहा कि भले ही एड ब्यूरो ने दावा किया कि ऋण स्वयं के ब्रांडिंग के लिए लिया गया था, लेकिन ब्रांडिंग का मुख्य उद्देश्य अधिक ग्राहकों को आकर्षित करना और लाभ कमाना होता है। इसलिए, यह लेन-देन व्यावसायिक उद्देश्य के लिए था और एड ब्यूरो उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 2(1)(d)(ii) के तहत 'उपभोक्ता' नहीं माना जा सकता।
पूर्व निर्णयों का संदर्भ:
कोर्ट ने श्रीकांत जी. मंत्री बनाम पंजाब नेशनल बैंक (2022) के मामले का संदर्भ दिया, जिसमें निर्णय लिया गया था कि एक स्टॉक ब्रोकर, जिसने अपने व्यवसाय के लिए ओवरड्राफ्ट सुविधा ली है, 'उपभोक्ता' नहीं माना जा सकता। इसके अलावा, नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम हरसोलिया मोटर्स (2023) के मामले में कहा गया था कि लेन-देन का प्रमुख उद्देश्य देखा जाना चाहिए कि क्या यह व्यावसायिक प्रकृति का था।
निर्णय का प्रभाव:
सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से यह स्पष्ट हो गया है कि यदि कोई व्यक्ति या संस्था लाभ कमाने के उद्देश्य से ऋण लेती है, तो वह उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत 'उपभोक्ता' नहीं मानी जाएगी। यह निर्णय बैंकों और वित्तीय संस्थानों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह उपभोक्ता शिकायतों की स्वीकार्यता को सीमित करता है।
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए ऋण लेने वालों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है। यह निर्णय स्पष्ट करता है कि व्यावसायिक लाभ के लिए लिया गया ऋण उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के दायरे में नहीं आता, जिससे बैंकों के खिलाफ उपभोक्ता शिकायतों की स्वीकार्यता सीमित होती है।