रासायनिक हमलों के खिलाफ भारत की नई ढाल: डीआरडीई का अकाडा डिवाइस


के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा  2025-03-03 18:24:50



 

दुनिया में बदलते युद्ध के स्वरूप और रासायनिक हमलों के बढ़ते खतरे के बीच, भारत ने अपनी सुरक्षा को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है। ग्वालियर स्थित रक्षा अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान (डीआरडीई) की टीम ने 'अकाडा' (ऑटोमेटिक केमिकल एजेंट डिटेक्टर और अलार्म) नामक उपकरण विकसित किया है, जो रासायनिक हमलों के प्रति सतर्कता और सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

रासायनिक हमलों के बढ़ते खतरे:

आधुनिक युद्ध के परिदृश्य में रासायनिक, जैविक और न्यूक्लियर हमलों का खतरा निरंतर बढ़ रहा है। इन हमलों से निपटने के लिए त्वरित पहचान और प्रतिक्रिया आवश्यक है, जिससे जनहानि को कम किया जा सके। 'अकाडा' उपकरण इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए विकसित किया गया है।

अकाडा की विशेषताएं:

' अकाडा उपकरण आयन मोबिलिटी स्पेक्ट्रोमेट्री के सिद्धांत पर कार्य करता है, जो हवा में घुले रासायनिक कणों की पहचान कर ऑडियो और वीडियो अलार्म जारी करता है। इसकी संवेदनशीलता इतनी अधिक है कि यह बारीक से बारीक रासायनिक कणों को भी पकड़ने में सक्षम है। इस उपकरण में 80% से अधिक स्वदेशी घटकों का उपयोग किया गया है, जो मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत मिशन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

वैश्विक परिदृश्य में भारत की उपलब्धि:

'अकाडा' के विकास के साथ, भारत दुनिया का चौथा देश बन गया है जिसने इस प्रकार की तकनीक को स्वदेशी रूप से विकसित किया है। अब तक, भारतीय सशस्त्र बलों को ऐसे उपकरणों के लिए अमेरिका और जर्मनी जैसे देशों पर निर्भर रहना पड़ता था। स्वदेशी अकाडा के माध्यम से न केवल विदेशी निर्भरता कम होगी, बल्कि उपकरणों के रखरखाव और स्पेयर पार्ट्स की आपूर्ति भी सुगम होगी।

भारतीय सेना और वायु सेना का विश्वास:

हाल ही में, भारतीय सेना और वायु सेना ने 'अकाडा' की 223 यूनिट्स की खरीद के लिए लगभग 80 करोड़ रुपये का ऑर्डर दिया है। यह आदेश डीआरडीई, ग्वालियर के वैज्ञानिकों के प्रति सशस्त्र बलों के विश्वास को दर्शाता है और स्वदेशी तकनीक की क्षमता को प्रमाणित करता है।

वैज्ञानिक डॉ. सुशील बाथम की नेतृत्व क्षमता:

अकाडा के विकास में प्रमुख भूमिका निभाने वाले वैज्ञानिक डॉ. सुशील बाथम ग्वालियर के निवासी हैं। उन्होंने 2010 में इस परियोजना पर कार्य प्रारंभ किया और 2015 में सफलता प्राप्त की। डॉ. बाथम की समर्पण भावना का उदाहरण है कि दिसंबर 2022 में एक पारिवारिक शोक के बावजूद, वे अपने प्रोजेक्ट के प्रति प्रतिबद्ध रहे और कार्य पर लौट आए।

स्वदेशी तकनीक की ओर बढ़ते कदम:

अकाडा का विकास भारत की स्वदेशी तकनीक की क्षमता को दर्शाता है। इससे न केवल विदेशी निर्भरता कम होगी, बल्कि देश की सुरक्षा में भी मजबूती आएगी। डीआरडीई, ग्वालियर की यह उपलब्धि 'मेक इन इंडिया' और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्यों की प्राप्ति में महत्वपूर्ण योगदान है।

अकाडा का विकास भारत की रक्षा प्रणाली में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह उपकरण न केवल रासायनिक हमलों के प्रति सतर्कता बढ़ाएगा, बल्कि स्वदेशी तकनीक के माध्यम से देश की सुरक्षा को भी सुदृढ़ करेगा। डीआरडीई, ग्वालियर और वैज्ञानिक डॉ. सुशील बाथम की यह उपलब्धि भारतीय विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में एक प्रेरणादायक उदाहरण है।


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