न्यायिक सीमा का पुनर्निर्धारण: उच्च न्यायालयों की मुआवजा देने की शक्ति पर सुप्रीम कोर्ट की स्पष्टता


के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा  2025-03-03 18:19:38



 

हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 439 के तहत जमानत देते समय उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय के पास आरोपी को मुआवजा देने का अधिकार नहीं है। यह निर्णय न्यायिक प्रक्रिया में अधिकार क्षेत्र की सीमाओं को स्पष्ट करता है और न्यायालयों की भूमिका को पुनः परिभाषित करता है।

मामले की पृष्ठभूमि:

यह मामला 'केंद्रीय नारकोटिक्स नियंत्रण ब्यूरो बनाम मन सिंह वर्मा' से संबंधित है, जिसमें एनसीबी ने जनवरी 2023 में एक ऑपरेशन के दौरान 1,280 ग्राम भूरे रंग का पाउडर जब्त किया था, जिसे हेरोइन माना गया था। आरोपियों पर नारकोटिक ड्रग्स और साइकोट्रॉपिक सब्सटेंस एक्ट (एनडीपीएस एक्ट) की धाराओं 8(सी), 21 और 29 के तहत मामला दर्ज किया गया और उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।

फोरेंसिक परीक्षण और हिरासत:

एनसीबी ने नमूनों को फोरेंसिक परीक्षण के लिए भेजा, और 30 जनवरी 2023 को केंद्रीय राजस्व नियंत्रण प्रयोगशाला (सीआरसीएल), नई दिल्ली ने रिपोर्ट दी कि नमूने में हेरोइन या अन्य मादक पदार्थ नहीं पाए गए। इसके बावजूद, एनसीबी ने चंडीगढ़ की केंद्रीय फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (सीएफएसएल) में पुनः परीक्षण के लिए नमूने भेजने की अनुमति मांगी, जो विशेष अदालत द्वारा स्वीकृत की गई। 5 अप्रैल 2023 को सीएफएसएल की रिपोर्ट ने भी पुष्टि की कि नमूनों में कोई मादक पदार्थ नहीं था। इसके बाद, एनसीबी ने क्लोजर रिपोर्ट दायर की और आरोपी 10 अप्रैल 2023 को रिहा कर दिए गए।

उच्च न्यायालय का मुआवजा आदेश:

रिहाई के बावजूद, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने आरोपी की लंबित जमानत याचिका की सुनवाई जारी रखी और अंततः एनसीबी निदेशक को ₹5 लाख का मुआवजा देने का आदेश दिया, यह मानते हुए कि आरोपी को चार महीने तक गलत तरीके से हिरासत में रखा गया था, जबकि परीक्षण रिपोर्ट नकारात्मक थीं।

सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया:

केंद्र सरकार, अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सत्य दर्शी संजय के माध्यम से, इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, यह तर्क देते हुए कि जमानत सुनवाई में मुआवजा नहीं दिया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सहमति व्यक्त की और स्पष्ट किया कि सीआरपीसी की धारा 439 के तहत न्यायालय का अधिकार केवल जमानत देने या अस्वीकार करने तक सीमित है और इसमें मुआवजा देने का अधिकार शामिल नहीं है।

एमिकस क्यूरी की भूमिका:

एमिकस क्यूरी पियूष के रॉय ने तर्क दिया कि जब पहली फोरेंसिक रिपोर्ट ने मादक पदार्थों की उपस्थिति से इनकार किया था, तो अधिकारियों को तुरंत मामला बंद करना चाहिए था, बजाय इसके कि वे दूसरे परीक्षण के लिए आगे बढ़ते। उन्होंने यह भी कहा कि एक ही नमूने का पुनः परीक्षण असाधारण परिस्थितियों में ही किया जा सकता है, जो इस मामले में नहीं था। उन्होंने पिछले सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला दिया, जहां गलत हिरासत के लिए मुआवजा दिया गया था।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय:

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे निर्णय रिट क्षेत्राधिकार के तहत दिए गए थे, न कि धारा 439 के तहत जमानत कार्यवाही में। अतः, सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय के मुआवजा आदेश को निरस्त कर दिया, यह मानते हुए कि जमानत कार्यवाही में मुआवजा देने का अधिकार नहीं है। हालांकि, न्यायालय ने यह भी कहा कि गलत हिरासत के मामलों में उचित मंच पर मुआवजा मांगा जा सकता है।

यह निर्णय न्यायिक प्रक्रिया में अधिकार क्षेत्र की सीमाओं को स्पष्ट करता है और न्यायालयों की भूमिका को पुनः परिभाषित करता है। यह सुनिश्चित करता है कि जमानत प्रक्रिया में न्यायालय केवल आरोपी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर विचार करें और मुआवजा देने जैसे अन्य मुद्दों के लिए उचित मंच का पालन किया जाए।


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