( खबर न्यायालय की) गोपनीयता के उल्लंघन पर हाई कोर्ट का कड़ा फैसला: लिटिगेंट पर ₹1 लाख का जुर्माना


  2025-03-02 18:12:28



 

न्यायालय की गरिमा और उसकी प्रक्रियाओं की गोपनीयता को बनाए रखना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। हाल ही में बॉम्बे हाई कोर्ट में एक ऐसा मामला सामने आया जिसने इस सिद्धांत को चुनौती दी, जब एक व्यक्ति ने अदालत की कार्यवाही को अपने मोबाइल फोन से रिकॉर्ड किया। इस अनुचित कृत्य के परिणामस्वरूप न्यायालय ने उस पर ₹1 लाख का जुर्माना लगाया, जो न्यायिक प्रक्रियाओं की पवित्रता को बनाए रखने के महत्व को रेखांकित करता है।

मामले की पृष्ठभूमि:

यह घटना एक संपत्ति विवाद से संबंधित याचिका की सुनवाई के दौरान हुई, जिसमें दो भाइयों के बीच विवाद था। सुनवाई के समय, प्रतिवादी पक्ष के एक रिश्तेदार, साजिद अब्दुल जब्बार पटेल, को अदालत कक्ष में मोबाइल फोन का उपयोग करते हुए देखा गया। कोर्ट स्टाफ ने पाया कि पटेल अदालत की कार्यवाही को अपने मोबाइल फोन पर ऑडियो-रिकॉर्ड कर रहे थे।

कोर्ट की प्रतिक्रिया:

न्यायालय के कर्मचारियों ने तुरंत पटेल से पूछताछ की, जिसमें उन्होंने स्वीकार किया कि वे प्रतिवादी नंबर 3 और 4 के रिश्तेदार हैं। जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्होंने अदालत की कार्यवाही को रिकॉर्ड करने की अनुमति ली है, तो उन्होंने नकारात्मक उत्तर दिया। इसके बाद, न्यायालय के कर्मचारियों ने उनके मोबाइल फोन को जब्त कर उसे बंद कर दिया और सुरक्षित हिरासत के लिए रजिस्ट्री को सौंप दिया।

वकील की प्रतिक्रिया:

प्रतिवादी पक्ष के वकील, हितेन वेनेगावकर, ने अदालत को सूचित किया कि पटेल को ऐसी कोई अनुमति नहीं दी गई थी और उनके इस कृत्य का कोई औचित्य नहीं है। हालांकि, उन्होंने अदालत से विनम्रता पूर्वक अनुरोध किया कि यह पटेल की पहली गलती है, इसलिए उन पर कठोर कार्रवाई न की जाए। इसके बाद, पटेल ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए अदालत कर्मचारियों की चिकित्सा कल्याण निधि में ₹1 लाख जमा करने की पेशकश की।

न्यायालय का निर्णय:

न्यायमूर्ति अजय गडकरी और न्यायमूर्ति कमल खाता की खंडपीठ ने पटेल की इस पेशकश को स्वीकार करते हुए इसे अदालत के प्रति उनकी प्रतिबद्धता के रूप में माना। अदालत ने पटेल को आदेश दिया कि वे इस राशि का भुगतान तीन दिनों के भीतर करें और मामले की अगली सुनवाई 5 मार्च को निर्धारित की।

न्यायिक गोपनीयता का महत्व:

यह मामला न्यायिक प्रक्रियाओं की गोपनीयता और सुरक्षा के महत्व को उजागर करता है। बॉम्बे हाई कोर्ट ने पहले भी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई के लिए नए नियम लागू किए हैं, जो 29 दिसंबर 2024 से महाराष्ट्र और गोवा में प्रभावी हैं। इन नियमों के तहत, न्यायालय की अनुमति के बिना किसी भी प्रकार की रिकॉर्डिंग सख्त प्रतिबंधित है। यह सुनिश्चित करने के लिए है कि न्यायिक प्रक्रियाओं की गोपनीयता और सुरक्षा बनी रहे। 

निजता का अधिकार और कानूनी प्रावधान:

न्यायालय की कार्यवाही की अनधिकृत रिकॉर्डिंग न केवल अदालत की अवमानना है, बल्कि यह व्यक्तियों के निजता के अधिकार का भी उल्लंघन है। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 72 के तहत, बिना अनुमति के किसी की बातचीत या जानकारी को रिकॉर्ड करना दंडनीय अपराध है, जिसमें जेल की सजा का भी प्रावधान है। 

न्यायालय की चेतावनी:

यह घटना एक महत्वपूर्ण संदेश देती है कि न्यायालय की प्रक्रियाओं का सम्मान और उनकी गोपनीयता का पालन प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनिवार्य है। कोर्ट रूम में किसी भी प्रकार की अनधिकृत रिकॉर्डिंग या उपकरण का उपयोग गंभीर परिणाम ला सकता है, जो न्यायिक प्रणाली की पवित्रता को बनाए रखने के लिए आवश्यक है।

बॉम्बे हाई कोर्ट का यह निर्णय न्यायालय की गरिमा और उसकी प्रक्रियाओं की गोपनीयता को बनाए रखने के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। यह सभी नागरिकों के लिए एक चेतावनी है कि वे न्यायालय की मर्यादा का सम्मान करें और उसकी प्रक्रियाओं का पालन करें, ताकि न्यायिक प्रणाली की पवित्रता और विश्वसनीयता बनी रहे।


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