निष्ब्ध हूं मैं क्या लिखूं रुदा गला, कांपती आंखें डरती उंगलियों से लिख रहा हूं मैं तो यही कहूंगा बिछड़े सभी बारी-बारी डॉ महेंद्र भाणावत नहीं रहे
के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा 2025-02-25 22:37:41

. बहुत बुरी ख़बर है यह. मुझ जैसे उनके दोस्त के लिए तो और भी ज़्यादा बुरी. महेंद्र जी से मेरी बहुत पुरानी आत्मीयता रही है. हम लोग अपने अपने पत्र के माध्यम से एक दूसरे से जुड़े थे। अभी हाल ही में मेरा हाल पूछने मेरे निवास बीकानेर आए थे। खूब चर्चा हुई। उन्होंने इस मुलाकात को अपने अखबार लोकरंजन में प्रकाशित किया और मैंने मेरे अखबार बीकानेर एक्सप्रेस में। लोक कलाओं के वह मर्मक्ष थे। उनके व्यक्तित्व के अनेक आयाम है लोक साहित्य के तो विश्वकोश थे. अपनी इस संपदा के संरक्षण और संवर्धन के लिए उन्होंने जितना कुछ किया उतना तो संस्थाएं भी नहीं कर पाती हैं. भारतीय लोक कला मण्डल की प्रतिष्ठा में उनकी भूमिका को कोई कैसे भूल सकता है! यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे उनका स्नेह मिला. उन्हें मेरी विनम्र श्रद्धांजलि और नमन. लेखक विचारक चिंतक संपादक——— मनोहर चावला की कलम से