बिना शादी के साथ रहना निर्लज्जता, फिर निजता का हनन कैसा? लिव-इन संबंधों पर हाईकोर्ट की टिप्पणी


के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा  2025-02-20 05:08:24



 

उत्तराखंड में हाल ही में लागू समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के तहत लिव-इन संबंधों के अनिवार्य पंजीकरण को चुनौती देने वाली याचिका पर नैनीताल हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि जब बिना शादी के लोग निर्लज्जता से साथ रह रहे हैं, तो निजता का हनन कैसे हो सकता है? इस टिप्पणी ने राज्य में लिव-इन संबंधों और निजता के अधिकार पर नई बहस छेड़ दी है।

याचिका का विवरण

देहरादून निवासी जय त्रिपाठी ने यूसीसी में लिव-इन संबंधों के अनिवार्य पंजीकरण के प्रावधान को चुनौती देते हुए याचिका दायर की थी। उनके अधिवक्ता ने तर्क दिया कि इस प्रावधान से राज्य सरकार गपशप को संस्थागत रूप दे रही है और यह निजता के अधिकार का उल्लंघन है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के 2017 के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि अनिवार्य पंजीकरण से लिव-इन जोड़ों की निजता प्रभावित हो रही है।

अदालत की टिप्पणी

मुख्य न्यायाधीश जी. नरेंदर और न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा, "आप समाज में रह रहे हैं, न कि जंगल की किसी गुफा में। पड़ोसी, समाज और दुनिया आपके रिश्ते के बारे में जानते हैं। बिना शादी के दो लोग निर्लज्जता से साथ रह रहे हैं, तो फिर निजता का हनन कैसे हो सकता है?" अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य सरकार ने यह नहीं कहा है कि आप साथ नहीं रह सकते।

राज्य सरकार का पक्ष

राज्य सरकार ने अपने पक्ष में कहा कि यूसीसी का उद्देश्य लिव-इन संबंधों को प्रतिबंधित करना नहीं है, बल्कि उन्हें कानूनी मान्यता और सुरक्षा प्रदान करना है। पंजीकरण से ऐसे जोड़ों के अधिकारों की रक्षा होगी और समाज में पारदर्शिता बढ़ेगी। सरकार ने यह भी बताया कि पंजीकरण की प्रक्रिया सरल और गोपनीय रखी गई है, ताकि जोड़े बिना किसी भय के इसे अपना सकें।

याचिकाकर्ता के तर्क

याचिकाकर्ता ने अल्मोड़ा के एक युवक की हत्या का उदाहरण देते हुए कहा कि अंतर-धार्मिक लिव-इन संबंधों के कारण यह घटना घटी। उनका तर्क था कि अनिवार्य पंजीकरण से ऐसे जोड़ों की पहचान सार्वजनिक हो जाएगी, जिससे उनकी सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। उन्होंने यह भी दावा किया कि यह प्रावधान संविधान द्वारा प्रदत्त निजता के अधिकार का उल्लंघन करता है।

अदालत का निर्णय

खंडपीठ ने इस याचिका को अन्य संबंधित याचिकाओं के साथ संबद्ध करते हुए अगली सुनवाई की तिथि 1 अप्रैल निर्धारित की है। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह इस मुद्दे पर अपना विस्तृत जवाब प्रस्तुत करे। साथ ही, अदालत ने यह भी कहा कि इस मामले में सभी पक्षों की दलीलों को ध्यान में रखते हुए निर्णय लिया जाएगा।

समान नागरिक संहिता (यूसीसी) और लिव-इन संबंध

उत्तराखंड में 27 जनवरी 2025 से समान नागरिक संहिता लागू की गई है, जिसमें लिव-इन संबंधों का पंजीकरण अनिवार्य किया गया है। इस प्रावधान के अनुसार, जोड़े को अपने संबंध की शुरुआत के एक महीने के भीतर पंजीकरण कराना होगा। पंजीकरण न कराने पर छह महीने की जेल या 25,000 रुपये का जुर्माना, या दोनों का प्रावधान है। इसका उद्देश्य लिव-इन जोड़ों को कानूनी सुरक्षा प्रदान करना और उनके अधिकारों की रक्षा करना है।

लिव-इन संबंधों पर सामाजिक दृष्टिकोण

भारतीय समाज में लिव-इन संबंधों को लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएँ हैं। कुछ लोग इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आधुनिकता का प्रतीक मानते हैं, जबकि अन्य इसे पारंपरिक मूल्यों के खिलाफ मानते हैं। उत्तराखंड में यूसीसी के तहत लिव-इन संबंधों के पंजीकरण का प्रावधान इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो ऐसे जोड़ों को कानूनी मान्यता और सुरक्षा प्रदान करता है।

नैनीताल हाईकोर्ट की यह टिप्पणी लिव-इन संबंधों और निजता के अधिकार पर एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि जब दो लोग बिना शादी के साथ रह रहे हैं और समाज में यह ज्ञात है, तो पंजीकरण से निजता का हनन कैसे हो सकता है। अगली सुनवाई में इस मुद्दे पर और विस्तृत चर्चा होने की संभावना है, जिससे लिव-इन जोड़ों के अधिकारों और सुरक्षा पर महत्वपूर्ण निर्णय लिए जा सकते हैं।


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