15 दिन के नवजात की जानलेवा संक्रमण से जंग, बारोड़ अस्पताल के डॉक्टरों ने बचाई जान


के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा  2025-02-18 14:32:27



 

इंदौर के बारोड़ अस्पताल में एक 15 दिन के नवजात शिशु ने दुर्लभ और घातक संक्रमण से जूझते हुए नया जीवन पाया है। सिनर्जिस्टिक बैक्टीरियल गैंग्रीन विद सेप्टीसीमिया नामक इस संक्रमण ने शिशु की त्वचा को काला कर दिया था और उसकी स्थिति अत्यंत गंभीर हो गई थी। डॉक्टरों की टीम ने अथक प्रयासों से शिशु की जान बचाई, जो चिकित्सा क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

संक्रमण का प्रारंभ और लक्षण

नवजात शिशु की पीठ और पुट्ठों की त्वचा अचानक काली पड़ने लगी, जो धीरे-धीरे पेट और नाभि तक फैल गई। संक्रमण रक्तप्रवाह के माध्यम से आंतरिक अंगों को प्रभावित करने लगा, जिससे शिशु सेप्टीसीमिया की चपेट में आ गया। ब्लड काउंट 29,000 तक पहुंच गया, और शिशु दूध पीने में असमर्थ हो गया, जिससे उसकी हालत और बिगड़ती गई।

बारोड़ अस्पताल में उपचार की शुरुआत

शिशु को तुरंत इंदौर के बारोड़ अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टर हिमांशु केलकर की निगरानी में उपचार शुरू हुआ। प्लास्टिक और रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी विशेषज्ञ डॉ. अश्विनी दास ने बताया कि यह मामला अत्यंत जटिल और चुनौतीपूर्ण था। सिनर्जिस्टिक बैक्टीरियल गैंग्रीन विद सेप्टीसीमिया में बैक्टीरिया की विभिन्न प्रजातियां त्वचा और अंदरूनी ऊतकों को तेजी से नष्ट कर देती हैं, जिससे घाव गहरे हो जाते हैं और त्वचा काली पड़ जाती है। यदि संक्रमण रक्तप्रवाह तक पहुंच जाए, तो सेप्टीसीमिया का खतरा बढ़ जाता है, जिससे अंगों की कार्यक्षमता प्रभावित होती है और जान का जोखिम होता है।

चिकित्सकीय चुनौतियाँ इंऔर समाधान

डॉक्टरों की टीम ने संक्रमण को नियंत्रित करने के लिए तुरंत एंटीबायोटिक थेरेपी शुरू की। संक्रमण के कारण शिशु की पीठ और पुट्ठों की त्वचा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुकी थी, जिसे पुनर्निर्मित करने के लिए फ्लैप एडवांसमेंट और मेट्रिडर्म (कृत्रिम त्वचा) का उपयोग किया गया। यह प्रक्रिया अत्यंत सावधानीपूर्वक और विशेषज्ञता की मांग करती है, जिसे डॉक्टरों ने सफलतापूर्वक अंजाम दिया।

आर्थिक चुनौतियाँ और सहायता

शिशु के पिता होटल में काम करते हैं, और सीमित संसाधनों के कारण लंबे इलाज का खर्च उठाना उनके लिए कठिन था। ऐसे में, एक कंपनी ने 40,000 रुपये मूल्य की कृत्रिम त्वचा, मेट्रिडर्म, निःशुल्क उपलब्ध कराई, जिसका दो बार उपयोग किया गया। यह दुनिया में पहली बार था कि 15 दिन के नवजात पर डर्मल सब्सटीट्यूट का सफल उपयोग किया गया, जिससे अंतरराष्ट्रीय चिकित्सा विशेषज्ञ भी उत्साहित हैं।

चिकित्सकीय टीम की समर्पित प्रयास

बारोड़ अस्पताल के निदेशक डॉ. संजय गोकुलदास ने इस सफलता पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि यह हमारी डॉक्टरों की टीम के सामूहिक प्रयासों की जीत है। इस ऑपरेशन में एनेस्थीसिया विशेषज्ञ डॉ. चौहान ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, वहीं पीडियाट्रिशियन डॉ. हिमांशु केलकर, पीडियाट्रिक आईसीयू की इंटेंसिविस्ट डॉ. ब्लूम वर्मा और उनकी टीम ने नवजात की स्थिति को स्थिर करने के लिए लगातार प्रयास किए। जब संक्रमण ने विकराल रूप ले लिया, तब प्लास्टिक और रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी विशेषज्ञ डॉ. अश्विनी दास ने चुनौती को स्वीकार कर इस केस को सफलतापूर्वक संभाला।

नवजात का स्वस्थ जीवन की ओर अग्रसर होना

आज, सार्थक नामक यह नवजात 4 किलो का स्वस्थ बच्चा है, जो जीवन के नए सफर पर है। इस चमत्कारी बचाव गाथा ने चिकित्सा जगत को नई प्रेरणा दी है और यह दिखाया है कि सही समय पर इलाज और समर्पण से असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है।


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