बाल साहित्य से बढ़ता मोहभंग: बच्चों को डिजिटल माध्यमों से हटाकर पुस्तकों की ओर आकर्षित करना एक बड़ी चुनौती
2025-02-18 04:32:40

अजित फाउंडेशन द्वारा आयोजित "वर्तमान समय में बाल साहित्य: दशा एवं दिशा" विषय पर आयोजित व्याख्यान में वरिष्ठ बाल साहित्यकार आशा शर्मा ने बाल साहित्य के बदलते स्वरूप और उसकी चुनौतियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भले ही आज के समय में बाल साहित्य का सृजन बड़े पैमाने पर हो रहा है, लेकिन बच्चों में पढ़ने की प्रवृत्ति लगातार कम होती जा रही है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जब हम बाल साहित्य की किसी भी विधा में लिखते हैं, तो उसमें बच्चों की रुचि, गुणवत्ता और नवीनता का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
बच्चों का साहित्य से बढ़ता मोहभंग
आशा शर्मा ने कहा कि वर्तमान समय में बच्चे पाठ्यक्रम की कविताओं और कहानियों तक ही सीमित रह गए हैं। पाठ्यक्रम से इतर साहित्य पढ़ने की उनकी रुचि लगभग समाप्त हो चुकी है। उन्होंने मोबाइल और डिजिटल माध्यमों के बढ़ते प्रभाव को इसका प्रमुख कारण माना। आशा शर्मा ने सुझाव दिया कि बच्चों को पुस्तकों से जोड़ने के लिए सामाजिक मंचों पर साहित्यिक चर्चाओं का आयोजन किया जाना चाहिए, ताकि उनमें साहित्य के प्रति रुचि विकसित हो सके। उन्होंने कहा कि पहले की दादी-नानी की कहानियाँ आज भी हमारे मन में बसी हुई हैं, लेकिन वर्तमान पीढ़ी केवल मोबाइल और इंटरनेट तक सीमित रह गई है, जिससे उनके साहित्यिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
बाल साहित्य की चुनौतियाँ
विषय प्रवर्तन करते हुए प्रसिद्ध व्यंग्यकार डॉ. अजय जोशी ने बाल साहित्य की मौजूदा चुनौतियों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि यह महत्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या जो साहित्य लिखा जा रहा है, वह बच्चों की रुचि के अनुरूप है? क्या यह उसी भाषा में लिखा जा रहा है, जिसमें वे पढ़ना चाहते हैं? उन्होंने कहा कि बाल साहित्यकारों को इन सभी पहलुओं पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है, ताकि बाल साहित्य अधिक से अधिक बच्चों को आकर्षित कर सके और उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित कर सके।
संस्था का प्रयास और बाल साहित्य को बढ़ावा
कार्यक्रम के आरंभ में संस्था समन्वयक संजय श्रीमाली ने अजित फाउंडेशन की गतिविधियों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने कहा कि जब बाल साहित्य पर चर्चा की जाती है, तो बच्चों की उपस्थिति भी आवश्यक होनी चाहिए, ताकि कार्यक्रम की सार्थकता बनी रहे। संस्था द्वारा बाल साहित्य को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से बाल पत्रिका "चहल-पहल" का मासिक प्रकाशन किया जाता है, जो बच्चों को साहित्य से जोड़ने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है।
बाल साहित्य को बढ़ावा देने की आवश्यकता
कार्यक्रम के समापन अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार राजाराम स्वर्णकार ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि इस तरह के आयोजनों से ही आने वाली पीढ़ी को साहित्य से जोड़ा जा सकता है। उन्होंने बाल साहित्य के महत्व को समझाते हुए अपनी कृति "म्हारी लाडो" बच्चों को उपहार स्वरूप भेंट की, जिससे बच्चों में उत्साह देखा गया।
गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति
इस कार्यक्रम में योगेन्द्र पुरोहित, शकुर बीकानेरी, प्रेमनारायण व्यास, मो. फारूक, महेश उपाध्याय, कन्हैयालाल, रविदत्त, जुगल किशोर पुरोहित सहित कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। सभी ने बाल साहित्य के संरक्षण और संवर्धन पर जोर दिया और बच्चों को साहित्य से जोड़ने के लिए विभिन्न सुझाव प्रस्तुत किए।
आज के समय में बच्चों को डिजिटल माध्यमों से हटाकर पुस्तकों की ओर आकर्षित करना एक बड़ी चुनौती बन गया है। ऐसे में, लेखकों और साहित्यकारों को चाहिए कि वे बच्चों की रुचि और भाषा शैली को ध्यान में रखते हुए साहित्य का सृजन करें। साथ ही, अभिभावकों और शिक्षकों को भी प्रयास करने होंगे कि वे बच्चों को पुस्तकों की ओर प्रेरित करें, ताकि उनकी कल्पनाशक्ति, विचारशीलता और नैतिकता का समुचित विकास हो सके।