मेरा शहर— जीना है अच्छे बने रहना और मुँह मत खोलना ! —— मनोहर चावला लेखक विचारक ,चिंतक ,संपादक बीकानेर एक्सप्रेस
के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा 2025-02-11 08:51:20

मेरा शहर— जीना है अच्छे बने रहना और मुँह मत खोलना !
—— मनोहर चावला लेखक विचारक ,चिंतक ,संपादक बीकानेर एक्सप्रेस
बीकानेर के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता और पत्रकार भवानीभाई लेखनी में जितने निडर और प्रखर थे उतने ही वे हास्य प्रदान इन्सान थे। वे मज़ाक़ ही मज़ाक़ में बहुत कुछ कह देते थे। चूँकि हम दोनों जिगरी दोस्त थे वह अंतरंग बाते भी मुझसे कर लेते थे। वे ही बताया करते थे कि हमारे बीकानेर के लोग बड़े मनमौजी और साहसी है वे बोलने में पारंगत होते ही है और बातो ही बातो में सामने वालो को भी निशस्त्र कर देते है। उन्होंने बताया कि एक बार कोटगेट पर मिल्ट्री की एक नई जीप जवानों को ले जा रही थी और भीड़ के कारण जगह - जगह रुक भी रही थी। पीछे से आ रहे एक मरियल घोड़े के इक्के वाले ने जोर से आवाज़ लगाई ए जवान— थाड़ी जीप ने आगे कर ले वरना मेरा घोड़ा बिगड़ गया तो थाड़ी जीप मूच जासी। मिलिट्री के जवान उसके जोशीले भाषण पर हँसते ही रहे। ऐसा ही एक वाक़या और सुनाया कि मैं एक दिन टिनोपोल लगाया कुर्ता- पायजामा पहने विश्व ज्योति थियेटर की और जा रहा था तब एक सज्जन किराडू जी पान वाले से पान लेकर मुँह में डालकर सामने आ गए और हैलो करते हुए पान की पीक सड़क पर दे मारी जो उछलकर मेरे सफेद चकचोंध कपड़ो को रंगीन करती गई। इस पर मैंने उनसे कहा - भाई मेरे- पीक तो संभाल कर फेंको। उनका जवाब था गिट लू क्या? इमाम लगा पान है पीक तो बाहर निकलेगी ही। भानी भाई चुप । वे शहर के निवासी थे और उनकी रग रग से वाक़िफ़ थे। वह वहाँ की हर गली- और चोराहो पर लगती चोपाल और वहाँ होती मोज़मस्ती की बाते हमे सुनाते थे। वे बताते थे कि यहाँ के लोग महाराजा गंगासिंह के भक्त थे। जो कुछ भी नगर में बनाया या बसाया गया उन सब का श्रेय वे लोग महाराजा गंगासिंह को देते थे। यहाँ तक कि कलकत्ता में बने हावड़ा ब्रिज का श्रेय भी वे महाराजा गंगासिंह को देते थे। वे लोग तो यहाँ तक कहते थे कि अगर नेहरू जी बीच में न आते तो आज एलिज़ाबेथ यहाँ की महारानी होती। भवानी भाई रस लेकर पाटे- गजट की मीठी मीठी बाते चाय पर हमे सुनाते। हमने भी एक दिन उन्हें सच्चा वाक़या बताया कि हम जब बीकानेर में पीआरओ थे तब हम एक दिन कोलायत जीप से पंचायत समिति की मीटिंग अटेंड करने जा रहे थे तभी नाल रोड पर पाँच पुराने साथी ख़ाली लौटा लिये नज़र आए। मैं वहाँ रुका और उनसे पूछा- आज ऑफ़िस नहीं गए क्या? उन्होंने कहा अभी तो निबटे है घर जाकर नहा- धोकर ऑफ़िस जाएँगे। मैं मीटिंग अटेंड कर शाम को वापिस बीकानेर लौट रहा था तब वही साथी लोग मुझे उसी जगह पानी भरे लौटे के साथ मिले, मैंने पूछा तो बताया कि भायला निबटने जा रिया है। खैर जब यह बात मैंने अपने मित्र भवानी भाई को बताई तो उन्होंने कहा कि आगे की बात मैं पूरी करता हूँ। उन्होंने बताया कि ये मस्त- मलन्दर लोग देर रात तक निबटते- निबटते कहानी- किस्से एक दूसरे को सुनाते रहते है। उधर देर होने पर परिजन पानी की बाल्टी लेकर उन्हें ढूंढते हुए उन्हें नाम से पुकारते है छोरो पानी कम पर गया हो तो आवाज़ देकर ले लो। यह बाते कितनी सच्ची थी या हास्य- विनोद पता नहीं। पर इतना जरूर मालूम है कि यहाँ का हर नागरिक बड़ा प्यारा है मददगार है व्यवहार का धनी है संतोषी है। सबसे अच्छी बात वह एक अच्छा इन्सान है। अपनी कला- संस्कृति को इन्होंने अच्छी तरह संजोया है। आज बीकानेर साहित्य, संस्कृति, कला और रंगकर्म के क्षेत्र में देश में अपना एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। कोई दिन यहाँ ऐसा नहीं होता जब कला, संस्कृति, साहित्य, संगीत और रंगमंच की चर्चा ना हो, आयोजन ना हो। अखबारों की सुर्खियां इन समारोह और आयोजनों के समाचारों से रंगी रहती है। लेकिन एक कमी जरूर अखरती है, वो यह कि यहाँ के लोग अपने हक- हकूक के लिये जागृत नहीं है। महाराजा गंगासिंह जी का बसाया- बनाया बीकानेर वही का वही है।विकास के दौर में बीकानेर सबसे पीछे है। हम कई सालों से रेलवे- क्रॉसिंग की समस्या से जूझ रहे है। टूटी सड़को पर हाथ- पैर तुड़वा रहे है। सीवरेज के गन्दे पानी में हम हमेशा चलते रहते है। हमारे सिनेमा- हॉल बंद हो चुके है। हमारे शेर चीते- रीछ भालू, चिड़ियाघर जू ना जाने कहाँ चले गये? पब्लिक पार्क के रंगीन फ़व्वारे न जाने कहाँ गुम हो गए। सूचना केंद्र डाक बंगले में चल रहा है। संभाग का सबसे बड़ा पीबीएम अस्पताल स्वाथ्य सेवाये देने में लड़खड़ा रहा है डाक्टर अस्पताल में मरीज देखने की बजाय घर पर देखना पसंद करते है। २०-२० सालों से डाक्टर यहाँ जमे बैठे है। सड़के छोटी होती जा रही है अतिक्रमण बढ़ते जा रहे है घर दुकानों में तब्दील हो रहे है। ऐसा लग रहा है हम एक निर्जीव शहर में रह रहे है बिना हिले- डुले , ख़ामोश एक मुर्दे की भाँति रह रहे है। कोई कुछ भी कहे, कोई कुछ भी करे, हमे बर्दाश्त करना है। कोई प्रतिक्रिया नहीं देनी। यही हमारा धर्म हो गया है यही हमारा कर्म। ज़िंदा ज़रूर है इन्सान का दर्जा भी पाये हुए है। लेकिन आवाज़ नहीं है।अन्याय के खिलाप हम बोल नहीं सकते? विकास के लिए अपनी आवाज़ को बुलन्द नहीं कर सकते। डरते है मुँह खोलने पर झगड़ालू होने का कहीं ठप्पा न लग जाये। इसलिए जीना है तो अच्छे बने रहना, मत बोलना, यहाँ की ख़ासियत है जिसका पूरा फ़ायदा ब्यूरोक्रेसी और नेता लोग उठा रहे है और उठाते ही रहेंगे। जागो- मेरे भाइयो अब तो जागो!