जो पत्रकार हमारा साथ देंगे उनके लिए सरकारी ख़ज़ाने के मुँह खुले है और जो साथ नहीं देंगे उनके लिए मीसा- डीआईआर तैयार है दोनों में से एक को चुनना आपको है। हमने दूसरा मार्ग मीसा- डी आई आर को चुना
के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा 2025-02-05 13:15:31

एक वो भी दौर था पत्रकारिता का !
———- मनोहर चावला
वरिष्ठ पत्रकार श्री श्याम जी आचार्य कहा करते थे कि बदलते समय में पत्रकारिता के मूल्य भी बदल गए है। एक समय था अखबार छपने से पहले हम देर रात्रि तक रिपोर्टर का इंतज़ार करते थे कि वो कोई एक्सक्लूज़िव समाचार लेकर आयेगा। लेकिन अब उसका इंतज़ार तो करते है। लेकिन समाचारों के लिए नहीं अपितु विज्ञापनों के लिए -कि हमारा रिपोर्टर ढेर सारे विज्ञापन लायेगा। अब पत्रकारिता रिपोर्टिंग पर नहीं, विज्ञापनों पर आधारित हो गई है। जब हम सरकार या किसी संस्थान के विज्ञपनों से अनुग्रहित रहेंगे तो भला हम उनकी कमियों को कैसे उजागर कर पायेगे ?इसलिये अब पत्रकारिता समाज का आईना नहीं रही। अब पत्रकार और उनके समाचार पत्र सरकार और संस्थानों के सरक्षक बन गए है । उनकी भलाई में ही वो अपनी भलाई देखते है और उनकी हर कमी को बड़ी खूबसूरती से टाल देते है। खैर जब हर क्षेत्र में मूल्यों में गिरावट आई है तो फिर भला पत्रकारिता का क्षेत्र अधूरा क्यो रहे? यहाँ हम अपनी बात करे हमने तो ५५ साल पहले का युग देखा है। हमने देश की आज़ादी के संघर्ष में पत्रकारिता के योगदान के बारे में सुना था और उसे दिल से संजोया था। हमारे समय में बीकानेर में चंद समाचार पत्र प्रकाशित होते थे। लेकिन उन पर कोई उँगली नहीं उठा सकता था। पत्रकार शंभु दयाल सक्सेना, अम्बालाल माथुर, मांगीलाल माथुर, अभय प्रकाश भटनागर, शुभु पटवा, दाऊ लाल आचार्य, भवानी भाई और खाकसार मनोहर चावला जो निडर और स्वच्छ पत्रकारिता करते थे। ये लोग पत्रकारिता के पवित्र पेशे पर चलने वाले लोग थे। इन्होंने जनहित के हर आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गेहूँ निकासी आन्दोलन हो, राजस्थान नहर से पानी पिलाने का आंदोलन हो, या फिर रामकिशन दास गुप्ता की अगुवाई में शहर के बीचो- बीच रेल फाटको को हटाने, बाइपास बनाने की बात हो — हर जगह ये पत्रकार हमेशा आगे रहे। शायद यहाँ के लोग भूले नहीं होंगे, जब भारत विभाजन और रियासतों के एकीकरण की बात चल रही थी तब भी पत्रकारो की वजह से बीकानेर पाकिस्तान का हिस्सा बनने से बचा। हुआ यू कि विभाजन के समय बीकानेर को बहावलपुर पाकिस्तान में मिलाने के लिए ख़ास मुस्लिम नुमाइन्दे महाराजा सादुलसिंह से मिलने बीकानेर आए। तब महाराजा ने हिंदू खानसामों की कुछ दिनों की छुट्टी कर दी। ताकि बात बाहर लीक ना हो जाए। एक ख़ानसामे ने यह बात पत्रकार दाऊ लाल आचार्य को बताई। आचार्य ने यह बात पत्रकार शंभु दयाल सक्सेना को। श्री सक्सेना उन दिनों पीटीआई के रिपॉटर थे वे अर्धरात्रि को टेलीग्राम ऑफिस गए और वहाँ से सारी घटना का विस्तृत विवरण टेलीग्राम से भेजा। अगले दिन दिल्ली के सभी अखबारों में यह समाचार छप गया कि बीकानेर पाकिस्तान में शामिल होने वाला है। फिर क्या, मैनन साहब ने उसी दिन कुछ बड़े नुमाइंदो को बीकानेर भेजा और उन्हें प्रलोभन एवम् ढेर सारी रियायते देने की घोषणा की तब कहीं जाकर महाराज साहब माने और आज बीकानेर भारत का एक महत्वपूर्ण अंग है। और हमे भारतवासी होने का गौरव मिला हुआ है। पत्रकारिता इसे कहते है न कि चाटुकारिता को। इमरजेंसी में भी सरकार के प्रलोभनों को ठुकरा कर इन्ही पत्रकारो ने इमरजेंसी का विरोध किया। मुझे याद है मुख्य मंत्री के बुलावे पर मैं, अभय प्रकाश भटनागर, श्री कमल नारायण शर्मा, भंवर शर्मा अटल और भी कई पत्रकार जयपुर गए थे। मुख्य मंत्री हरिदेव जोशी ने साफ़ कहा कि जो पत्रकार हमारा साथ देंगे उनके लिए सरकारी ख़ज़ाने के मुँह खुले है और जो साथ नहीं देंगे उनके लिए मीसा- डीआईआर तैयार है दोनों में से एक को चुनना आपको है। हमने दूसरा मार्ग मीसा- डी आई आर को चुना और यातनाएँ सहते हुए हँसते हँसते बराबर अख़बार निकाला। बस अपना इतना ही कहना है कि जिस पेशे को चुनो उसमे ईमानदारी से बिना लाभ- हानि के अपने आप को समर्पित कर दो। और पत्रकारिता तो फिर एक पवित्र पेशा है। हर देशवासी की निगाह समाचार पत्र पर ही टिकी होती है।