यादे: अखबारों की कटिंग और अखबारों की जाँच, अखबार के महत्व को कम न समझे, अब लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की बात बेमानी है ——- मनोहर चावला
के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा 2024-12-23 17:40:47

बीस अख़बार प्रतिदिन सुबह सुबह मेरे घर पर आते थे और मैं चाय पीते पीते उन अखबारों की ख़ास- ख़ास ख़बरों पर लाल निशान लगाता। दफ़्तर १० बजे पहुँच कर कटिंग सेक्शन में उन अखबारों को देता और इस काम के लिये बैठे पाँच लोग निशान लगी न्यूजों को काटकर चिपका कर विभाग की अलग अलग फ़ाइल बना देते। मैं उन्हें लेकर मुख्य मंत्री श्री भैरोसिंह शेखावत के निवास पर भिजवा देता। शाम को फ़ाइल मुख्य मंत्री के हस्ताक्षर सहित वापिस आ जाती। कुछ न्यूजो पर संबंधित विभाग से स्पष्टीकरण माँगने का संकेत होता। मैं कटिंग की कॉपी लगाकर विभाग को पत्र लिखता और फिर उस विभाग के उत्तर को मुख्य मंत्री जी के सामने प्रस्तुत करता। इस प्रकार शेखावत जी राजस्थान के बारे में हमेशा अप डेट रहते। यही काम मुझे सौंपा हुआ था वैसे जिलो में भी स्थानीय अखबारों की कटिंग पी आर ओ को जिलाधीश के पास भेजनी होती थी। अब यह कार्य संभवता ठप सा है। पहले छोटी सी छोटी न्यूज पर एक्शन होता था अब बड़ी से बड़ी न्यूज पर भी जू भी नहीं रेंगती। खैर हम आपको बता देवे कि सूचना एवम जनसम्पर्क विभाग को प्रदेश के समाचार पत्रों की प्रसार संख्या की जाँच का भी अधिकार है। यह सभी जानते है कि अधिकांश पत्र विक्षापन दर जायदा लेने के लिए बढ़ा चढ़ा कर प्रसार संख्या बताते है। लेकिन सरकारे अपने समर्थन के कारण अपने इस अधिकार का प्रयोग नहीं करती । एक बार मुख्य मंत्री शेखावत जी ने इसका उपयोग किया था। हुआ यों कि एक पत्रकार राजकुमार ने मुख्यमंत्री शेखावत जी के खिलाप बहुत अनगर्ल लिख दिया। श्री शेखावत को बहुत गुस्सा आया और उन्होंने तुरंत सभी समाचार पत्रों की जाँच के आदेश दे दिये। एक टीम का गठन किया गया। जिसका इंचार्ज मुझे बनाया गया। दो पीआरओ को भी मुझे सौंपा गया। सभी जिलों के कलेक्टरों को आदेश दिए गए कि जब हमारी टीम उनके जिलों में समाचार पत्र की जांच हेतु आए उनके साथ एक आरएएस स्तर का अधिकारी साथ कर पूरा सहयोग करे। बस फिर क्या था शाम के समय मुख्यमंत्री कार्यालय से सीलबंद लिफाफा आ जाता जिसमे शहर और समाचार पत्रों का नाम होता। मैं अपनी टीम को सूचित करता और चल पड़ते अख़बारवालों के दफ्तरों पर छापा डालने। कभी जयपुर, कभी अजमेर, कभी नागौर , कभी कोटा, कभी उदयपुर, कभी अलवर,कभी हनुमानगढ़, कभी भरतपुर, सभी प्रदेश को छाँट मारा। लगभग ६०० अख़बार विक्षापनो से निरस्त किए। खूब प्रलोभन मिले, दवाब डाले गए, धमकिया मिली, लेकिन ईमानदारी और निष्पक्षता से अपना काम किया। क्योंकि प्रेस सलाहकार श्री के एल कोचर और सचिव श्री सुनील अरोड़ा का सर पर हाथ था। हमने बड़े से बड़े समाचार पत्र के प्रसार संख्या की जाँच की। बस फिर क्या था हलचल मच गई और पत्रकारो के एक शिष्टमण्डल ने मुख्यमंत्री से बात की कि किसी एक पत्रकार की गलती का ख़ामियाज़ा समस्त पत्रकार जगत क्यो भुगते ? मुख्यमंत्री ने इसे गंभीरता से लेते हुये जाँच कार्य को बंद करवाया। पत्रकारो ने राहत की सांस ली और पत्रकार राजकुमार को जेल की हवा खानी पड़ी। तब से पत्रकारो की प्रसार संख्या की जाँच का कार्य बंद है अब तो मुख्य मंत्री जिस पत्र पर मेहरबान हो उसका घर मालामाल हो जाता है और जिस पत्र से वह नाराज़ हो वो फिर रोटी को तरसता है। इसलिये अब हर पत्र का मालिक सरकार को खुश रखने में ही अपनी भलाई समझता है। अब लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की बात बेमानी है।