संगीत की दुनिया में अपूरणीय क्षति: तबला सम्राट उस्ताद ज़ाकिर हुसैन का निधन
के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा 2024-12-17 07:45:24

तबला वादन को विश्व स्तर पर पहचान दिलाने वाले और भारतीय संगीत को एक नई ऊंचाई पर पहुंचाने वाले उस्ताद ज़ाकिर हुसैन का सोमवार को 73 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में इडियोपैथिक पल्मोनरी फाइब्रोसिस नामक फेफड़ों की बीमारी के कारण अंतिम सांस ली। उनके निधन से संगीत की दुनिया में एक गहरा शून्य उत्पन्न हो गया है।
प्रधानमंत्री ने जताया दुःख
उस्ताद जाकिर हुसैन के निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक्स पर एक पोस्ट में लिखा, "महान तबला वादक उस्ताद जाकिर हुसैन जी के निधन से बहुत दुख हुआ। उन्हें एक सच्चे प्रतिभाशाली व्यक्ति के रूप में याद किया जाएगा जिन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत की दुनिया में क्रांति ला दी। उन्होंने तबले को वैश्विक मंच पर भी लाया और अपनी बेजोड़ लय से लाखों लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसके माध्यम से, उन्होंने भारतीय शास्त्रीय परंपराओं को वैश्विक संगीत के साथ सहजता से मिश्रित किया, इस प्रकार वे सांस्कृतिक एकता के प्रतीक बन गए। उनके प्रतिष्ठित प्रदर्शन और भावपूर्ण रचनाएँ संगीतकारों और संगीत प्रेमियों की पीढ़ियों को प्रेरित करने में योगदान देंगी। उनके परिवार, दोस्तों और वैश्विक संगीत समुदाय के प्रति मेरी हार्दिक संवेदनाएँ।"
महाराष्ट्र के राज्यपाल और शरद पवार की श्रद्धांजलि
महाराष्ट्र के राज्यपाल सी. पी. राधाकृष्णन ने गहरा शोक व्यक्त करते हुए कहा, "देश ने एक सांस्कृतिक प्रतीक और महान कलाकार खो दिया है।" उन्होंने उस्ताद ज़ाकिर हुसैन को उनके पिता उस्ताद अल्ला रक्खा के एक समर्पित शिष्य के रूप में याद किया, जिन्होंने तबले को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाई।
पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद पवार ने भी शोक व्यक्त करते हुए कहा, "यह कला की दुनिया के लिए एक अपूरणीय क्षति है। उन्होंने भारतीय संगीत और तबले को वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठा दिलाई।"
संगीत की 60 वर्षों की यात्रा
उस्ताद ज़ाकिर हुसैन का संगीत करियर 60 वर्षों से अधिक समय तक फैला रहा। उन्होंने मात्र 7 वर्ष की आयु में पहला मंच प्रदर्शन किया और 12 वर्ष की उम्र में देश-विदेश का दौरा शुरू किया।
उन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत को विश्व संगीत के साथ जोड़ा। उन्होंने तीन ग्रैमी अवॉर्ड जीतकर भारतीय संगीत का परचम लहराया।
ग्रैमी पुरस्कार और वैश्विक पहचान
2024 के ग्रैमी अवार्ड्स में, उस्ताद ज़ाकिर हुसैन ने "बेस्ट ग्लोबल म्यूजिक एल्बम", "बेस्ट ग्लोबल म्यूजिक परफॉर्मेंस" और "बेस्ट कंटेम्परेरी इंस्ट्रूमेंटल एल्बम" के लिए पुरस्कार जीते। उनके एल्बम "दिस मोमेंट" और "पश्तो" को आलोचकों और श्रोताओं ने खूब सराहा।
उन्होंने संगीत के साथ शास्त्रीय, जैज और फ्यूजन का बेहतरीन संयोजन प्रस्तुत किया। उनकी बैंड शक्ति के साथ परफॉर्मेंस विश्व स्तर पर प्रसिद्ध रही।
संगीत के प्रति समर्पण
अपने जीवन के हर पहलू में संगीत को समर्पित करते हुए, ज़ाकिर हुसैन ने तीन संगीत कॉन्सर्टो भी रचे। 2015 में उन्होंने तबला और ऑर्केस्ट्रा के लिए पहला कॉन्सर्टो भारत में प्रस्तुत किया, जो अमेरिका और यूरोप में भी सराहा गया।
सामाजिक संदेश और वाह ताज की यादें
ज़ाकिर हुसैन ने 1988 में ताजमहल चाय के प्रसिद्ध विज्ञापन में अपनी अभिनय प्रतिभा का प्रदर्शन किया। "वाह उस्ताद, वाह!" से लेकर "वाह ताज" तक के उनके संवाद आज भी भारतीयों की यादों में ताजा हैं।
उन्होंने अपने पिता अल्ला रक्खा के साथ 'मिले सुर मेरा तुम्हारा' गाने में भी भाग लिया, जो राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बना।
निजी जीवन और आदर्श विचार
उस्ताद ज़ाकिर हुसैन ने कॉर्पोरेट इवेंट्स और शादियों में प्रदर्शन करने से मना करते हुए कहा था कि संगीत को उचित मंच और माहौल मिलना चाहिए। वे हमेशा समय के पाबंद और अनुशासनप्रिय रहे।
निधन से उपजा शून्य
उनके निधन से न केवल भारतीय संगीत बल्कि वैश्विक संगीत जगत को अपूरणीय क्षति हुई है। उनकी पत्नी एंटोनिया मिन्नेकोला और दो बेटियां अनीसा और इसाबेला ने संगीत की इस विरासत को संजोने का वादा किया है।
संगीत का अनंत युग
उस्ताद ज़ाकिर हुसैन की विरासत उनके अनोखे तालवादन, उनके अनगिनत श्रोताओं और उनके द्वारा स्थापित संगीत परंपरा के रूप में जीवित रहेगी। उनके असंख्य प्रशंसक बस यही कह सकते हैं – "वाह उस्ताद!"