मनोहर चावला पत्रकारो का नेतृत्व करते हुए पैलेस ऑन व्हील पर जाएगे और टूरिज्म अधिकारियों एवम पत्रकारो के बीच समन्वय का कार्य करेगे। आदेश मिलने पर मेरे भी होश उड़ गए। १० दिन वो भी वरिष्ठम पत्रकारो के बीच


के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा  2024-12-16 13:52:36



रब चाहे तो सारी कायनात पूरा करने में उसे जुट जाती है। 

————- मनोहर चावला 

 

इन दिनों मैं आपसे अपने अनुभवों को शेयर कर रहा हूँ। इस बार भी उपरवाले की मेहरबानी का सच्चा किसा बयान कर रहा हूँ। डी पी आर जयपुर में काम करने का आनन्द ही कुछ और है और फिर जब ललित के पंवार जैसे डायनेमिक और ज़िंदादिल डायरेक्टर हो। हम सब अधिकारी मिलजुल कर टीम वर्क से समर्पित होकर कार्य करते थे। हम लोगो ने अपना एक संगठन बना रखा था। हर शनिवार रात्रि हम एक साथ कंट्रीब्यूट्री बाहर होटल में खाना खाते और खुली चर्चा भी करते। कोई छोटा- बड़ा नहीं था हम सब लोगो में बहुत प्यार था हम लोग त्योहार भी एक साथ मनाते। सरकार की छवि निखारने में कोई कौर- कसर नहीं रखते। इस दरमियान रेल मंत्रालय और राजस्थान सरकार के बीच हुए समझौते की तहत शाही रेल चलाने का निर्णय हुआ। राजस्थान की कला, संस्कृति को ,ऐतिहासिक विरासत किले,हवेलिया को लाइम- लाइट करने ,टूरिज्म को प्रमोट करने, विदेशियों को इस और आकर्षित करने के लिए यह ट्रेन चलाई गई थी । १० दिन की इस ट्रेन की यात्रा में जयपुर, सवाईमाधोपुर, चित्तौड़गढ़, उदयपुर, जोधपुर, जैसलमेर, भरतपुर और आगरा तक का रोचक और शानदार सफ़र था। इस शाही रेलगाड़ी जिसे प्लेस ऑन व्हील कहा गया इसे प्रमोट करने के लिए जयपुर से २० वरिष्ठ पत्रकारों का चयन हुआ। लाइज़निग का कार्य निदेशक, सूचना एवम जनसंपर्क को सौंपा गया। ललित के पंवार १० दिनों तक विभाग छोड़ नहीं सकते थे उन्होंने यह कार्य डा. अमर सिंह राठौड़ पर छोड़ दिया। राठौड़ निजी कारणों से नहीं जा सकते थे उन्होंने इस कार्य के लिए रामावतार बुनकर को कहा। बुनकर जी मुख्य मंत्री के पास लगे हुए थे। वो जाने में असमर्थ थे। घुमफिर कर यह कार्य मुझे ( खाकसार) को सौंपा गया। आदेश में मनोहर चावला पत्रकारो का नेतृत्व करते हुए पैलेस ऑन व्हील पर जाएगे और टूरिज्म अधिकारियों एवम पत्रकारो के बीच समन्वय का कार्य करेगे। आदेश मिलने पर मेरे भी होश उड़ गए। १० दिन वो भी वरिष्ठम पत्रकारो के बीच —- चीभ को दाँतो तले आने से कैसे बचाना होगा? यह सोचकर रात्रि भर निद्रा नहीं आई। अगले दिन बोरिया- बिस्तर लेकर जयपुर स्टेशन पर पहुँचे। सभी पत्रकार बंधु भी वहाँ पहुँच गए थे कुछ विदेशी मेहमान दिल्ली से इस ट्रेन में आये थे। हरेक पत्रकार को अलग अलग कूपा दिया गया। जिसमे बिस्तर, टेलीफ़ोन, टी वी- वीसीआर- कुछ फ़िल्मों के केसट इंटरकॉम सब कुछ कूपे में था साउंड प्रूफ़ गाड़ी थी चाय- कॉफ़ी- ठंडा- गर्म नमकीन- मीठा लाने के लिए बैरे बार बार पूछ रहे थे। जयपुर से ट्रेन रवाना होकर सुबह सवाई माधोपुर पहुँची। स्टेशन पर सभी पत्रकारो और विदेशी अतिथियों की राजस्थानी वेशभूषा से सुसज्जित सुंदर बालिकाओ ने आरती उतारी और गीत गाये। डी- लक्स बसों में हमे बैठा कर रणथम्भौर का अवलोकन कराया गया। जहां शेरो को देखकर हम रोमांचित हो उठे। वापसी ट्रेन पर आकर चित्तौड़ पहुँचे। वहाँ भी दिल खोलकर शानदार स्वागत हुआ। पद्मिनी महल और चितौड़ क़िला देखकर पत्रकार अभिभूत हुए। अब आये उदयपुर- जहाँ ट्रेन से नीचे उतरते ही हाथियो ने अपनी सूँड़ से सबको माला पहनाई। कलाकरों ने शहनाई बजाई ।वहाँ से लग्ज़री बस द्वारा जलमहल हम बोट्स से गए। वहाँ शानदार खाना खाया और फिर राणा प्रताप क़िले को देखा यहाँ फिर ट्रेन से जोधपुर जहाँ मेहरानगढ़ फोर्ट, सूर्य मन्दिर, गजसिंह पैलेस देखने के बाद जैसलमेर के लिए रवाना हुए और वहाँ पट्टवों की हवेलिया, घरसीसर सरोवर का सोंदर्य,सम के रेतीले टीलो पर फायर डांस और कालबेलिया नृत्य देखने के बाद फिर ट्रेन से भरतपुर पहुँचे और वहाँ के केवल अभ्यारण में तरह तरह के रंग- बिरंगी पशु- पक्षियों अजगर- साँपो को हमे दिखाया गया। भरतपुर से आगरा जहाँ हमे फाइव स्टार होटल में ठहराया गया। संगीत और आर्केस्ट्रा की मधुर धुन में लज़ीज़ खाना खिलाया गया। इसके बाद हमारा ताजमहल पर फ़ोटो सेसन हुआ। बाद में आगरा फोर्ट का अवलोकन और उसके बाद स्टेशन जहाँ हम काफ़ी लोग वापिसी भरतपुर बस से आ गए। ट्रेन दिल्ली गई और हम बस से जयपुर आ गए। अगले दिन इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ़ इंडिया, हिन्दुस्थान टाइम्स, राजस्थान पत्रिका में शाही रेलगाड़ी की शानदार कवरेज थी । जब यह सारा वर्तांत मैंने अपने दोस्तों और उच्चाधिकारियों को सुनाया और यह भी बताया कि इस ट्रेन के प्रत्येक यात्री का किराया एक लाख दस हज़ार रुपये है। फिर क्या था अब पछताए क्या होत, जब चिड़िया चुग गई खेत। लेकिन मेरी किस्मत में दस दिन की जन्नत शाही रेल यात्रा जो लिखी थी। यहाँ कहना पड़ा-ऊपर वाले तेरा जवाब नहीं।वैसे भी रब चाहे तब सारी कायनात उसे पूरा करने में जुट जाती है मेरी शाही रेल सफ़र के लिए भी यही हुआ।  चिंतक, विचारक ,लेखक ,संपादक बीकानेर एक्सप्रेस   मनोहर चावला  की कलम से


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