समझौते की शर्तों का उल्लंघन: सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्स्थापन आवेदन के अधिकार को स्पष्ट किया 


के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा  2024-12-15 06:12:28



 

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया कि यदि किसी पक्ष द्वारा समझौते की शर्तों का पालन नहीं किया गया, तो संबंधित पक्ष को पुनर्स्थापन (रिकॉल) आवेदन दायर करने का अधिकार है। यह निर्णय विशेष रूप से सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC), 1908 के आदेश 23 नियम 3 के तहत प्राप्त अधिकारों को रेखांकित करता है।

समझौते के बाद भी चुनौती का अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा कि समझौते की वैधता और कानूनीता को चुनौती दी जा सकती है, भले ही इस पर डिक्री (निर्णय) पारित हो चुकी हो। कोर्ट ने यह भी कहा कि समझौता दर्ज करने का मतलब यह नहीं है कि अपील बहाल करने की स्वतंत्रता नहीं है। यह एक वैधानिक अधिकार है जो CPC के तहत किसी भी समझौते पर लागू होता है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला राजस्थान हाई कोर्ट के एक आदेश के खिलाफ दायर अपील से जुड़ा है। हाई कोर्ट ने एक रिकॉल आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि समझौते को रिकॉर्ड करने के बाद अपील बहाल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि समझौते की शर्तों का पालन नहीं किया गया और इसीलिए उन्होंने पुनर्स्थापन आवेदन दाखिल किया।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला

जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस मनोज मिश्रा की खंडपीठ ने राजस्थान हाई कोर्ट के निर्णय को खारिज करते हुए कहा कि मूल अदालत, जिसने समझौता दर्ज किया था, ही समझौते की पुनर्स्थापन प्रक्रिया पर विचार करने के लिए उपयुक्त है। अदालत ने कहा कि CPC के तहत अपील या नई याचिका दायर करने की अनुमति नहीं है, और पुनर्स्थापन ही एकमात्र उपाय है।

"समझौता कानून का विश्लेषण और सार्वजनिक नीति"

अदालत ने निर्णय में कहा, "यदि किसी पक्ष के लिए वैधानिक उपाय उपलब्ध है, तो अदालत द्वारा उस उपाय को नकारा नहीं जा सकता। यह सार्वजनिक नीति के खिलाफ है।" सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस तरह की स्थिति में न्यायालयों को पक्षकारों के वैधानिक अधिकारों को सीमित करने से बचना चाहिए।

पुनर्स्थापन का अधिकार क्यों महत्वपूर्ण है?

सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में जोर दिया कि समझौता दर्ज करते समय या उसके बाद, यदि कोई पक्ष समझौते को चुनौती देता है, तो इसका निपटारा केवल मूल अदालत में ही हो सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि अन्य कोई उपाय, जैसे नई याचिका या अपील, CPC के तहत मान्य नहीं है।

हाई कोर्ट के फैसले को खारिज करते हुए आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के उस तर्क को अस्वीकार कर दिया जिसमें कहा गया था कि समझौता दर्ज करने के आदेश में पुनर्स्थापन का प्रावधान नहीं है। कोर्ट ने कहा कि ऐसा दृष्टिकोण याचिकाकर्ता के वैधानिक अधिकार को नकारता है।

भविष्य के लिए प्रभाव और निष्कर्ष

इस निर्णय के साथ सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि न्यायालयों को पक्षकारों के वैधानिक अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए और समझौते की प्रक्रियाओं को चुनौती देने के लिए पुनर्स्थापन का अधिकार सुरक्षित रहना चाहिए। मामला अब पुनर्विचार के लिए राजस्थान हाई कोर्ट को भेज दिया गया है।


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