सार्वजनिक व्यवस्था और कानून-व्यवस्था के बीच अंतर: सुप्रीम कोर्ट ने निरोधात्मक हिरासत आदेश रद्द किया
के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा 2024-12-14 16:36:20

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया, जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि निरोधात्मक हिरासत (Preventive Detention) एक कठोर उपाय है और इसे हर प्रकार के शांति भंग के मामलों में लागू नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने कहा कि यह अधिकार केवल तभी प्रयोग किया जाना चाहिए, जब किसी व्यक्ति के कृत्य सार्वजनिक व्यवस्था को भंग करने की प्रवृत्ति रखते हों।
निरोधात्मक हिरासत: कठोर उपाय या आवश्यक हथियार?
जस्टिस बी.आर. गवई और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि सार्वजनिक व्यवस्था और कानून-व्यवस्था के बीच एक स्पष्ट अंतर है। कोर्ट ने राम मनोहर लोहिया बनाम बिहार राज्य मामले का संदर्भ देते हुए कहा कि हर प्रकार की शांति भंग सार्वजनिक अव्यवस्था नहीं होती। “जब किसी व्यक्ति को कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए नियंत्रित किया जा सकता है, तब तक निरोधात्मक हिरासत का सहारा नहीं लिया जाना चाहिए। यह केवल उन मामलों में लागू हो सकता है, जहां व्यक्ति के कृत्य सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करते हैं,” कोर्ट ने कहा।
मामले का विवरण: दोषी या अतिरंजित आरोप?
मामले में याचिकाकर्ता (प्रस्तावित हिरासतकर्ता) पिछले कुछ वर्षों से देशी शराब निर्माण में लिप्त था। इस कारण आसपास के क्षेत्र के लोग परेशान थे और कई ने तो अपने घर छोड़ दिए थे। शिकायत दर्ज कराने की किसी में हिम्मत नहीं हुई।
* याचिकाकर्ता के खिलाफ अवैध शराब के छह मामले दर्ज थे।
* हालांकि, आबकारी अधिकारियों ने उसे एक बार भी गिरफ्तार करने की आवश्यकता नहीं समझी।
* दो गवाहों के बयान इस आरोप को प्रमाणित करने के लिए पेश किए गए, लेकिन वे सामान्य, अस्पष्ट और लगभग एक जैसे थे।
न्यायालय का अवलोकन: सबूतों की गुणवत्ता
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि गवाहों के बयान न केवल अस्पष्ट थे, बल्कि उनकी विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़ा हुआ। “बयान, भले ही उन्हें सही मान लिया जाए, केवल यह दिखाते हैं कि याचिकाकर्ता ने गवाहों को व्यक्तिगत रूप से धमकाया। इन बयानों में यह नहीं दिखाया गया कि धमकी सार्वजनिक रूप से दी गई, जिससे गांव वालों के मन में याचिकाकर्ता को लेकर डर पैदा हुआ हो,” कोर्ट ने कहा।
सार्वजनिक व्यवस्था बनाम कानून-व्यवस्था का अंतर
कोर्ट ने सार्वजनिक व्यवस्था और कानून-व्यवस्था के बीच स्पष्ट अंतर को रेखांकित किया:
1 कानून-व्यवस्था का मामला:
* यदि कोई व्यक्ति घर के अंदर किसी अपराध को अंजाम देता है, तो यह सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित नहीं करता।
2 सार्वजनिक व्यवस्था का मामला:
* यदि कोई व्यक्ति सार्वजनिक स्थान पर हिंसा या डर का माहौल बनाता है, तो यह सार्वजनिक व्यवस्था का उल्लंघन है।
'निरोधात्मक हिरासत' का दुरुपयोग नहीं किया जा सकता
कोर्ट ने अमीना बेगम बनाम तेलंगाना राज्य मामले का हवाला देते हुए कहा कि निरोधात्मक हिरासत कानून केवल अपवाद स्वरूप लागू किए जाने चाहिए। तेलंगाना में बढ़ती प्रवृत्ति की आलोचना करते हुए कोर्ट ने कहा कि यह संविधान द्वारा गारंटीकृत स्वतंत्रता और अधिकारों के खिलाफ है।
फैसले का महत्व और निष्कर्ष
कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता के कृत्यों को सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा बताने का कोई ठोस आधार नहीं था।
* निरोधात्मक हिरासत आदेश को निरस्त करते हुए कोर्ट ने याचिकाकर्ता को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया।
* कोर्ट ने दोहराया कि निरोधात्मक हिरासत का प्रयोग केवल आपात स्थितियों में होना चाहिए।