दूसरी पत्नी नहीं, पहली पत्नी को मिलेगा पारिवारिक पेंशन का अधिकार: राजस्थान हाईकोर्ट


के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा  2024-12-14 07:24:37



 

राजस्थान हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा कि केवल कानूनी तलाक के बाद ही दूसरी शादी को वैध माना जा सकता है। समाजिक तलाक को कानूनी मान्यता नहीं होने के कारण, मृत सरकारी कर्मचारी की पहली पत्नी को ही पारिवारिक पेंशन का अधिकार मिलेगा। इस मामले ने भारतीय विवाह और पेंशन नियमों पर एक नई बहस छेड़ दी है।

मामले की पृष्ठभूमि: पहली पत्नी बनाम दूसरी पत्नी

यह मामला राजस्थान में एक सरकारी कर्मचारी की मौत के बाद शुरू हुआ।

* सरकारी कर्मचारी 1983 में सेवानिवृत्त हुए और 1987 में तलाक के लिए एक याचिका दायर की, लेकिन यह याचिका संबंधित कोर्ट में प्रस्तुत नहीं की गई।

* कर्मचारी ने अपनी पहली पत्नी को वैधानिक पत्नी के रूप में स्वीकार किया, लेकिन समाजिक तलाक का हवाला दिया।

* कर्मचारी ने पेंशन विभाग में दूसरी पत्नी और उनके बच्चों को नामांकित करने का अनुरोध किया था।

2016 में उनकी मृत्यु के बाद पहली पत्नी ने पारिवारिक पेंशन के लिए आवेदन किया, लेकिन राज्य सरकार ने उत्तराधिकार प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने की शर्त लगाई।

कानूनी सवाल: समाजिक तलाक और दूसरी शादी का वैधता

1 समाजिक तलाक का कानूनी प्रभाव:

   * समाजिक तलाक की किसी भी समुदाय में मान्यता हो सकती है, लेकिन यह कानूनन तलाक का विकल्प नहीं है।

   * पहली पत्नी, जब तक कानूनी तलाक नहीं होता, मृतक की विधवा मानी जाएगी।

2 दूसरी शादी की वैधता:

   * हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 5 के अनुसार, दूसरी शादी के लिए पहली शादी का कानूनी  रूप से समाप्त होना अनिवार्य है।

   * धारा 11 के तहत, यदि यह शर्त पूरी नहीं होती, तो दूसरी शादी शून्य मानी जाएगी।

हाईकोर्ट का फैसला: पहली पत्नी का अधिकार

जस्टिस अनुप कुमार धंड की बेंच ने निर्णय दिया कि:

समाजिक तलाक कानूनी रूप से मान्य नहीं है।

नियम 66 और 67 के तहत पारिवारिक पेंशन केवल वैध पत्नी को दी जा सकती है।

दूसरी पत्नी, जिसका विवाह शून्य था, विधवा के रूप में पेंशन का दावा नहीं कर सकती।

उत्तराधिकार प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं है क्योंकि पारिवारिक पेंशन ऋण या सुरक्षा के अंतर्गत नहीं आती।

बच्चों के अधिकार: वैधता और लाभ

हालांकि दूसरी शादी शून्य मानी गई, लेकिन कोर्ट ने कहा कि:

दूसरी शादी से जन्मे बच्चे वैध माने जाएंगे।

 उन्हें मृत कर्मचारी के टर्मिनल लाभों का अधिकार होगा।

राज्य को इन बच्चों को लाभ देने के आदेश दिए गए।

उत्तराधिकार प्रमाणपत्र पर फैसला

कोर्ट ने भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि:

 उत्तराधिकार प्रमाणपत्र ऋण वसूलने या सुरक्षा के लिए आवश्यक होता है।

 पेंशन व्यक्तिगत संपत्ति है और इसके लिए प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं है।

फैसले का व्यापक प्रभाव

इस फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया कि:

समाजिक मान्यताओं का स्थान कानून की व्याख्या से अलग है।

यह फैसला सरकारी कर्मचारियों के बीच दूसरी शादी की प्रवृत्ति को हतोत्साहित करेगा।


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