दहेज प्रताड़ना पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख: 12 साल बाद भी शिकायत को माना वैध


  2024-12-13 15:14:10



 

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि पत्नी द्वारा 12 साल तक क्रूरता की शिकायत न करने के बावजूद उसकी शिकायत को अवैध नहीं माना जा सकता। यह फैसला उस मामले में आया जिसमें एक महिला ने शादी के 12 साल बाद आत्महत्या कर ली। इस घटना के बाद उसके पिता ने पति के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 498ए (दहेज प्रताड़ना) और 306 (आत्महत्या के लिए उकसाने) के तहत शिकायत दर्ज करवाई।

क्या हैं मामला?

महिला के पिता का आरोप है कि आत्महत्या से एक साल पहले पति ने उसकी सोने की गहने, जो स्त्रीधन के अंतर्गत आते हैं, बेच दिए थे। जब महिला ने गहने वापस मांगे तो उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया। शिकायत में यह भी कहा गया कि महिला ने कई मौकों पर अपने पति द्वारा की गई क्रूरता की शिकायत की थी।

सुप्रीम कोर्ट का रुख: देर से शिकायत का मतलब नहीं कि प्रताड़ना नहीं हुई

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की बेंच ने कहा, "यह तर्क कि महिला ने 12 साल तक कोई शिकायत नहीं की, यह साबित नहीं करता कि कोई क्रूरता या प्रताड़ना नहीं हुई।" कोर्ट ने यह भी नोट किया कि शिकायत में क्रूरता के विशिष्ट उदाहरण दर्ज थे।

धारा 498ए के तहत क्रूरता का दायरा

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में आईपीसी की धारा 498ए के तहत क्रूरता की व्याख्या की। इसमें निम्नलिखित स्थितियों को 'क्रूरता' माना गया:

ऐसी जानबूझकर की गई हरकतें जो महिला को आत्महत्या करने के लिए मजबूर करें या उसके जीवन, अंगों या मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर खतरे में डालें।

महिला को प्रताड़ित करना, खासकर अगर यह किसी अवैध मांग को पूरा करने के लिए किया गया हो।

क्रूरता को अपराध मानने के लिए और क्या जरूरी है?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि क्रूरता केवल शारीरिक या मानसिक कष्ट देने तक सीमित नहीं है। इसे अपराध माना जाएगा यदि इसका उद्देश्य महिला को आत्महत्या के लिए मजबूर करना, गंभीर चोट पहुंचाना, या अवैध मांग पूरी करवाने के लिए दबाव बनाना हो।

धारा 306 पर राहत: आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप खारिज

हालांकि, कोर्ट ने पाया कि पति पर आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप (धारा 306) साबित नहीं होता। इस आधार पर पति को इस आरोप से मुक्त कर दिया गया।

महत्वपूर्ण निष्कर्ष और संदेश

इस फैसले ने स्पष्ट किया कि महिलाओं को उनके अधिकारों की रक्षा के लिए शिकायत दर्ज करने में विलंब का सामना नहीं करना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि 'देर से न्याय' का मतलब 'न्याय से इनकार' नहीं होना चाहिए।

न्यायपालिका का समाज को संदेश

यह निर्णय एक मजबूत संदेश देता है कि महिलाओं के खिलाफ दहेज प्रताड़ना जैसे अपराधों को गंभीरता से लिया जाएगा। साथ ही, यह भी स्पष्ट करता है कि 'समय' एकमात्र मापदंड नहीं हो सकता, जिससे क्रूरता के मामलों को खारिज किया जाए।

यह फैसला उन महिलाओं के लिए उम्मीद की किरण है जो वर्षों तक चुप रहीं लेकिन न्याय के लिए लड़ने का साहस जुटा पाईं।


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