सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: समान स्थिति वाले अफसरों को मिलेगी स्वतः राहत
के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा 2024-12-11 15:56:51

सुप्रीम कोर्ट ने एक महिला आर्मी अफसर को स्थायी कमीशन देने का फैसला सुनाते हुए एक महत्वपूर्ण सिद्धांत को दोहराया है। कोर्ट ने कहा कि यदि समान स्थिति में अन्य व्यक्तियों को किसी सरकारी विभाग के खिलाफ राहत मिल चुकी है, तो उन व्यक्तियों को स्वतः वही लाभ मिलेगा जिन्होंने मामले में मुकदमा नहीं लड़ा। इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि अदालत अब ऐसे मामलों में दोबारा मुकदमा लड़ने की आवश्यकता नहीं समझती जब समान स्थिति में किसी को राहत मिल चुकी हो।
महिला अफसर की अपील: स्थायी कमीशन की मांग
इस मामले में अपीलकर्ता महिला अफसर 2008 में आर्मी डेंटल कोर में शॉर्ट सर्विस कमीशन ऑफिसर के तौर पर भर्ती हुई थीं। वे अन्य समान स्थिति वाले अफसरों के समान स्थायी कमीशन की पात्रता की मांग कर रही थीं, जिन्हें तीन मौके मिले थे स्थायी कमीशन प्राप्त करने के लिए। हालांकि, 2013 में पॉलिसी में किए गए संशोधन के बाद, उन्हें तीसरा मौका नहीं दिया गया, जो अन्य अफसरों को मिला था।
आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल (AFT) का निर्णय और अपीलकर्ता की स्थिति
आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल (AFT) ने समान स्थिति में अन्य आवेदनकर्ताओं को राहत दी थी और उन्हें एक बार के लिए आयु सीमा में छूट दी थी। लेकिन अपीलकर्ता को यह राहत नहीं दी गई, क्योंकि वह पहले के मामले में पार्टी नहीं थीं। हालांकि, अपीलकर्ता के पास व्यक्तिगत समस्याएं थीं, जिसके कारण वह मामले में शामिल नहीं हो पाई थीं।
सुप्रीम कोर्ट ने AFT के आदेश को रद्द किया
सुप्रीम कोर्ट ने AFT के आदेश को रद्द करते हुए यह स्पष्ट किया कि अपीलकर्ता को अलग से मुकदमा नहीं लड़ना चाहिए था, क्योंकि अन्य समान स्थिति वाले अफसरों को पहले ही राहत मिल चुकी थी। अदालत ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि यह सिद्धांत पहले से स्थापित है कि जब किसी नागरिक ने सरकारी विभाग की कार्रवाई के खिलाफ अदालत में शिकायत की और उस पर फैसला आया, तो समान स्थिति में अन्य व्यक्तियों को भी उसी राहत का स्वचालित लाभ मिलना चाहिए, बिना उन्हें अदालत जाने की आवश्यकता के।
समान स्थिति वाले अफसरों को दिए गए लाभ का विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि किसी व्यक्ति को न्यायालय से राहत मिल चुकी है, तो वह व्यक्ति जिसने मुकदमा नहीं लड़ा है, उसे भी वही राहत मिलेगी। इस फैसले में न्यायमूर्ति BR गवाई और KV विश्वनाथन ने यह कहा कि अपीलकर्ता को उसी राहत का लाभ मिलना चाहिए था जो अन्य अफसरों को AFT से मिला था। अदालत ने यह भी कहा कि यह प्रथा नहीं होनी चाहिए कि जिन व्यक्तियों ने न्यायालय में मुकदमा नहीं लड़ा, उन्हें सजा दी जाए, जबकि समान स्थिति में अन्य व्यक्तियों को राहत मिल चुकी हो।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
अदालत ने पहले के फैसलों, अमृतलाल बेरी वि. कलेक्टर, दिल्ली (1975) और K.I. शैफर्ड वि. भारत सरकार (1987) का हवाला देते हुए कहा कि यह असंवैधानिक है कि जो व्यक्ति अदालत में नहीं गए, उन्हें राहत से वंचित कर दिया जाए। इसलिए अपीलकर्ता को उसी लाभ का विस्तार किया जाना चाहिए, जो अन्य समान स्थिति वाले अफसरों को पहले ही मिल चुका था।
अपील स्वीकृत, समान राहत दी गई
सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकृत करते हुए फैसला दिया कि अपीलकर्ता को भी वही लाभ मिलेगा जो अन्य समान स्थिति वाले अफसरों को दिया गया था। इस फैसले से यह साबित हुआ कि यदि सरकार या सेना के किसी विभाग में किसी व्यक्ति को राहत मिलती है, तो अन्य संबंधित व्यक्तियों को स्वतः वह राहत मिलनी चाहिए, चाहे वे उस मुकदमे का हिस्सा न हो।