सुप्रीम कोर्ट ने कंडीशनल बिक्री के आधार पर मॉर्गेज पर दिया ऐतिहासिक निर्णय
के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा 2024-12-11 10:35:26

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट किया कि यदि एक मॉर्गेज डीड (बंधक पत्र) में यह प्रावधान हो कि बकाया राशि न चुकाने पर संपत्ति का ट्रांसफर मर्तजित विक्रय के रूप में होगा, तो इसे "साधारण मॉर्गेज" नहीं माना जा सकता। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति प्रसन्न बी. वराले की बेंच ने इस मामले में यह निर्णय लिया, जिसमें 1990 में एक संपत्ति को बंधक रखकर लिए गए ₹75,000 के ऋण को लेकर विवाद था।
मामले की पृष्ठभूमि: 1990 में बंधक समझौता
यह मामला एक संपत्ति के बंधक रखने से जुड़ा है, जिसे 1990 में ₹75,000 के ऋण के बदले बंधक किया गया था। बंधक डीड में यह शर्त थी कि यदि ऋण की राशि तीन वर्षों के अंदर चुकता नहीं की जाती, तो बंधक संपत्ति का स्वामित्व ऋणदाता (प्रतिवादी) को हस्तांतरित कर दिया जाएगा। 1993 में, बंधक रखवाने वाला (वादक) ₹1,20,000 का भुगतान करने के लिए सामने आया, जो कि बंधक समझौते के तहत राशि थी, लेकिन ऋणदाता ने उसे स्वीकार नहीं किया।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय: बंधक को कंडीशनल बिक्री माना
सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों के निर्णयों को पलटते हुए यह निर्णय दिया कि यह लेन-देन "कंडीशनल बिक्री" के तहत आता है, न कि साधारण बंधक के रूप में। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि बंधक डीड में स्पष्ट रूप से यह शर्त थी कि यदि ऋण चुकता नहीं किया गया, तो संपत्ति का ट्रांसफर पूरी तरह से ऋणदाता को हो जाएगा। यह शर्त एक 'कंडीशनल बिक्री' के अनुरूप है, और इसे साधारण बंधक के रूप में नहीं देखा जा सकता।
निचली अदालतों की गलती: बंधक को साधारण माना
सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों के उस फैसले को खारिज किया जिसमें यह माना गया था कि वादक की निरंतर संपत्ति पर कब्जे को देखते हुए यह लेन-देन साधारण बंधक था। कोर्ट ने कहा कि वादक का कब्जा "अनुमति प्राप्त कब्जा" था, जो केवल संपत्ति की सुरक्षा के लिए था और इससे कोई अतिरिक्त अधिकार नहीं मिलता था।
कंडीशनल बिक्री का विश्लेषण: बंधक डीड की शर्तें महत्वपूर्ण
सुप्रीम कोर्ट ने यह माना कि बंधक डीड की शर्तें पूरी तरह से कंडीशनल बिक्री के अनुरूप हैं, जिसमें बकाया राशि न चुकाने पर बंधक संपत्ति को बेचने की शर्त शामिल थी। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि "कंडीशनल बिक्री" के तहत संपत्ति का स्वामित्व ट्रांसफर होता है, जब बंधक रखवाने वाला निर्धारित समय के भीतर भुगतान नहीं करता है।
न्यायिक पुनर्विचार: बंधक के कब्जे का महत्व
कोर्ट ने यह भी कहा कि बंधक डीड में स्पष्ट रूप से यह प्रावधान था कि बकाया राशि चुकता न होने पर संपत्ति का ट्रांसफर हो जाएगा, और इस शर्त को दोनों पक्षों ने माना था। वादक का कब्जा "अनुमति प्राप्त कब्जा" था, और इससे यह सिद्ध नहीं होता कि यह साधारण बंधक था।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश: वादक की अपील स्वीकार
आखिरकार, सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिवादी की अपील स्वीकार करते हुए बंधक को कंडीशनल बिक्री के रूप में माना और कहा कि निचली अदालतों ने बंधक डीड की शर्तों को सही तरीके से नहीं समझा। कोर्ट ने बंधक डीड की स्पष्ट शर्तों को ध्यान में रखते हुए यह फैसला लिया कि यह लेन-देन "साधारण बंधक" नहीं बल्कि "कंडीशनल बिक्री के आधार पर बंधक" है।
बंधक डीड के महत्व पर सुप्रीम कोर्ट का रुख
इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया कि किसी भी बंधक लेन-देन को उसके शर्तों और उसकी प्रकृति के आधार पर सही तरीके से समझना जरूरी है। कोर्ट ने कहा कि अगर बंधक डीड में कोई ऐसी शर्त हो कि भुगतान में विफलता पर संपत्ति का ट्रांसफर होगा, तो यह "कंडीशनल बिक्री" के तहत आता है, न कि साधारण बंधक के रूप में। इस फैसले से बंधक लेन-देन से जुड़े कानूनी प्रावधानों को लेकर नई दिशा तय होती है।