सुप्रीम कोर्ट ने धारा 498A के दुरुपयोग पर जताई चिंता, अदालतों को दी सावधानी बरतने की सलाह


के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा  2024-12-11 06:55:54



 

भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A, जिसे 1983 में महिलाओं के प्रति पति और ससुराल वालों द्वारा की जाने वाली क्रूरता को रोकने के उद्देश्य से शामिल किया गया था, हाल के वर्षों में इसके दुरुपयोग की बढ़ती प्रवृत्ति ने न्यायपालिका को चिंतित कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं, जो इस कानून के सही उपयोग और दुरुपयोग की रोकथाम के लिए मार्गदर्शन प्रदान करती हैं।

धारा 498A का उद्देश्य और दुरुपयोग की प्रवृत्ति

धारा 498A का मुख्य उद्देश्य महिलाओं को उनके पति और ससुराल वालों द्वारा की जाने वाली क्रूरता से सुरक्षा प्रदान करना है। हालांकि, समय के साथ इस प्रावधान के दुरुपयोग की घटनाएं बढ़ी हैं, जहां इसे व्यक्तिगत प्रतिशोध का उपकरण बना लिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि अदालतों को ऐसे मामलों में अत्यधिक फंसाने के उदाहरणों की पहचान करनी चाहिए और अनावश्यक कष्ट से बचने के लिए सावधान रहना चाहिए। 

अदालतों की भूमिका और सावधानी की आवश्यकता

न्यायालयों ने धारा 498A के तहत दायर शिकायतों की सावधानीपूर्वक जांच की आवश्यकता पर बल दिया है। अदालतों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आरोप स्पष्ट और सुसंगत हों, और केवल वैवाहिक विवादों के कारण दुरुपयोग न हों। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अदालतों को ऐसे मामलों में सावधानी बरतनी चाहिए, जहां आरोप अस्पष्ट या अतिशयोक्तिपूर्ण हों, ताकि निर्दोष व्यक्तियों को अनावश्यक कष्ट न हो। 

विधायी सुधार की आवश्यकता

सुप्रीम कोर्ट ने विधायिका से इस कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए आवश्यक सुधार करने का आग्रह किया है। अदालत ने कहा है कि धारा 498A के दुरुपयोग से उत्पन्न सामाजिक असंतोष पर चिंता व्यक्त की है और इस प्रावधान में सुधार की आवश्यकता जताई है, ताकि यह अपने मूल उद्देश्य को पूरा कर सके और उत्पीड़न का उपकरण न बने। 

धारा 498A का उद्देश्य महिलाओं की सुरक्षा है, लेकिन इसके दुरुपयोग ने न्यायपालिका को चिंतित कर दिया है। अदालतों को ऐसे मामलों में सावधानीपूर्वक जांच करनी चाहिए और विधायिका को आवश्यक सुधार करने चाहिए, ताकि इस कानून का सही उपयोग सुनिश्चित हो सके और दुरुपयोग की प्रवृत्ति रोकी जा सके।


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