क्रिमिनल रिट पिटीशन के रूप में क्यों दर्ज की गई याचिका? सुप्रीम कोर्ट का दिल्ली हाईकोर्ट से बड़ा सवाल
के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा 2024-12-10 16:01:36

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट की रजिस्ट्री द्वारा एक याचिका को गलत तरीके से 'क्रिमिनल रिट पिटीशन' के रूप में वर्गीकृत करने पर हैरानी जताई है। यह याचिका भारतीय दंड संहिता (CrPC) की धारा 482 और संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत दायर की गई थी। अदालत ने दिल्ली हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल से जवाब तलब किया और पूछा कि किस आधार पर इसे इस रूप में दर्ज किया गया।
क्या है पूरा मामला?
सुप्रीम कोर्ट में जिस याचिका पर सवाल उठाया गया था, वह दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर की गई थी। इस आदेश में दिल्ली हाई कोर्ट ने एक पहली सूचना रिपोर्ट (FIR) को रद्द कर दिया था। याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में अनुच्छेद 227 और धारा 482 के तहत आवेदन किया था, जो कि विशेष रूप से अदालतों को शक्ति देता है कि वे अपने अधीनस्थ न्यायालयों के फैसलों की समीक्षा कर सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट की हैरान करने वाली टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट की पीठ में न्यायमूर्ति पंकज मित्तल और न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने इस विषय पर गहरी असहमति जताई। उन्होंने कहा, "हमें यह जानकर आश्चर्य हुआ कि यह याचिका, जो अनुच्छेद 227 और धारा 482 के तहत दायर की गई थी, उसे 'क्रिमिनल रिट पिटीशन' के रूप में लिया गया, जो कि पहली नजर में गलत प्रतीत होता है। अनुच्छेद 227/482 के तहत दायर याचिका को क्रिमिनल रिट पिटीशन के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता।"
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट से जवाब मांगा
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को समझते हुए दिल्ली हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल से जवाब तलब किया। अदालत ने कहा, "चूंकि पूरे मामले को पहले ही रद्द कर दिया गया है, हम दिल्ली हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल से यह जानना चाहते हैं कि एक याचिका, जो अनुच्छेद 227 और धारा 482 के तहत दायर की गई थी, उसे 'क्रिमिनल रिट पिटीशन' क्यों कहा गया?" कोर्ट ने इसके साथ ही याचिका पर नोटिस जारी करने का आदेश दिया।
दिल्ली हाई कोर्ट का रद्द किया गया आदेश
दिल्ली हाई कोर्ट ने इस याचिका के तहत दायर FIR को रद्द कर दिया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय पर टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रक्रिया के दौरान उठाए गए कदम और याचिका के साथ जुड़ी कानूनी तकनीकीताएँ जरूरी हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून के अनुसार ऐसी याचिकाओं को उचित तरीके से वर्गीकृत किया जाना चाहिए।
क्या था याचिका में?
याचिका में पहले सूचना रिपोर्ट (FIR) को रद्द करने के खिलाफ दायर की गई थी, जिसके बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने इसे रद्द कर दिया। याचिकाकर्ता का कहना था कि FIR में कुछ गलत तरीके से आरोप लगाए गए थे और इसे रद्द किया जाना चाहिए। यह याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई थी, जहां कोर्ट ने न केवल दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश पर सवाल उठाया, बल्कि याचिका के गलत तरीके से वर्गीकरण पर भी गौर किया।
कानूनी दृष्टिकोण और सुप्रीम कोर्ट का कदम
यह मामला इस बात को भी उजागर करता है कि अदालतों द्वारा दायर याचिकाओं का सही तरीके से वर्गीकरण किया जाना कितना महत्वपूर्ण है। जब याचिका का नाम गलत तरीके से रखा जाता है तो उससे कानूनी प्रक्रिया में भ्रम पैदा हो सकता है और यह न्याय की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट का यह कदम यह सुनिश्चित करने की दिशा में है कि किसी भी याचिका को सही तरीके से प्रक्रिया में रखा जाए।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा उठाए गए सवाल और उसके द्वारा दिए गए आदेश से यह स्पष्ट होता है कि न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और स्पष्टता जरूरी है। अदालत ने दिल्ली हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल से जवाब मांगा है, जो यह सुनिश्चित करेगा कि याचिकाओं को सही तरीके से वर्गीकृत किया जाए। यह कदम भारतीय न्यायिक प्रणाली में सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।