अंधे उम्मीदवार की नियुक्ति में देरी- सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को फटकारा, जारी हुआ अवमानना नोटिस
के कुमार आहूजा, 2024-12-10 09:30:35

अंधे उम्मीदवार की नियुक्ति में देरी- सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को फटकारा, जारी हुआ अवमानना नोटिस
केंद्र सरकार पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा सवाल उठाया है। अदालत ने केंद्रीय विभाग को तलब करते हुए उसकी निंदा की, क्योंकि उसने 2008 के सिविल सेवा परीक्षा में सफल हुए दृष्टिहीन उम्मीदवार पंकज कुमार श्रीवास्तव और अन्य विकलांग उम्मीदवारों को नियुक्ति आदेश नहीं दिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अवमानना का नोटिस जारी किया और विभाग से जवाब तलब किया है।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला केंद्रीय सरकार और पंकज कुमार श्रीवास्तव के बीच है, जिन्होंने 2008 में सिविल सेवा परीक्षा पास की थी। पंकज कुमार श्रीवास्तव और अन्य विकलांग उम्मीदवारों को नियुक्ति दी जानी थी, क्योंकि उनके लिए विकलांग व्यक्तियों के लिए आरक्षित पदों पर कई रिक्तियां थीं, जो अभी तक भरी नहीं गई थीं। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार को आदेश दिया था कि इन उम्मीदवारों को नियुक्त किया जाए, लेकिन पांच महीने से ज्यादा समय बीतने के बाद भी नियुक्ति आदेश जारी नहीं किए गए।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार के रवैये पर नाराजगी व्यक्त की। न्यायमूर्ति अभय एस ओका और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि यह व्यवहार विकलांग व्यक्तियों के प्रति केंद्र सरकार का भेदभावपूर्ण दृष्टिकोण है। न्यायालय ने कहा, "हर दिन हम देख रहे हैं कि विकलांग व्यक्तियों के साथ ऐसा व्यवहार किया जा रहा है। आप उम्मीदवारों को नियुक्त नहीं करना चाहते और उन्हें परीक्षा के नाम पर टालते जा रहे हैं, ताकि आप कुछ निकाल सकें और उनकी उम्मीदवारी को खारिज कर सकें।"
अवमानना नोटिस और समय सीमा
सुप्रीम कोर्ट ने विभाग के सचिव को अवमानना नोटिस जारी करते हुए कहा कि वे 19 दिसंबर तक हलफनामा दाखिल कर यह बताएं कि आदेश का पालन क्यों नहीं किया गया। यदि 19 दिसंबर तक हलफनामा दाखिल नहीं किया जाता है, तो 20 दिसंबर को सचिव को वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से कोर्ट में उपस्थित होना होगा। कोर्ट ने कहा, "अगर विभाग समय पर आदेश का पालन नहीं करता है, तो यह अदालत अवमानना की कार्रवाई शुरू कर सकती है।"
पंकज कुमार श्रीवास्तव की लंबी लड़ाई
पंकज कुमार श्रीवास्तव की यह लड़ाई 2009 से चल रही है। उन्होंने 2008 में सिविल सेवा परीक्षा दी थी, लेकिन परीक्षा के सभी चरणों को पास करने के बावजूद उन्हें कोई नियुक्ति नहीं मिली। श्रीवास्तव ने तब केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) में आवेदन दायर किया, जिसमें यह कहा गया कि विकलांग व्यक्तियों को सामान्य श्रेणी के उम्मीदवारों के बराबर माना जाना चाहिए, न कि आरक्षित श्रेणी में। CAT के आदेश के बाद दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी इस आदेश को मंजूरी दी थी। इसके बावजूद केंद्रीय सरकार ने श्रीवास्तव की नियुक्ति नहीं की, और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया।
सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने 8 जुलाई को आदेश दिया था कि केंद्र सरकार श्रीवास्तव और अन्य विकलांग उम्मीदवारों की नियुक्ति करे। अदालत ने केंद्र सरकार को आड़े हाथों लिया, यह कहते हुए कि यदि सरकार ने विकलांग व्यक्तियों के लिए 1995 के एक्ट को सही ढंग से लागू किया होता, तो श्रीवास्तव को न्याय पाने के लिए अदालतों का चक्कर नहीं काटना पड़ता। अदालत ने यह भी कहा कि सरकार का कार्य नहीं करना और इन उम्मीदवारों के अधिकारों का उल्लंघन करना न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों की गंभीर अवहेलना है।
अंतिम आदेश और सरकार की जिम्मेदारी
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को एक और मौका दिया और विभाग से कहा कि वह 19 दिसंबर तक आदेश का पालन सुनिश्चित करे। यदि ऐसा नहीं होता है, तो सचिव को अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश होना होगा। इस मामले में न्यायालय ने सरकार के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया और यह सुनिश्चित किया कि श्रीवास्तव और अन्य विकलांग उम्मीदवारों के अधिकारों का उल्लंघन न हो।
यह मामला न केवल एक उम्मीदवार के व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा की बात करता है, बल्कि विकलांग व्यक्तियों के लिए संवेदनशीलता और न्यायिक सुधार की आवश्यकता को भी उजागर करता है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश से यह स्पष्ट हो गया है कि सरकार को विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी और किसी भी प्रकार के भेदभावपूर्ण रवैये को रोकना होगा।