सच को कैसे रोकोगे ,मेरी रग रग में तो सच है ,निष्पक्ष निडर लिखूंगा, चाहे कुछ भी हो जाए, सच में पानी के बहाव को न रोको। हाथ गन्दा हो जाएगा ! —— मनोहर चावला
के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा 2024-12-09 21:58:08

सच को कैसे रोकोगे ,मेरी रग रग में तो सच है ,निष्पक्ष निडर लिखूंगा, चाहे कुछ भी हो जाए, सच में पानी के बहाव को न रोको। हाथ गन्दा हो जाएगा !
—— मनोहर चावला
अजमेर में पी आर ओ के पद पर रहते अच्छा समय बीता। एक तो कलेक्टर आर एन मीणा का सानिध्य और दूसरी और वहाँ के पत्रकारो का प्यार— वहाँ नौकरी में काफ़ी आनन्द आया। पत्रकार एस पी मित्तल, आर के चौधरी, श्याम भाईसाहब, इन्द्र नटराज, अशोक शर्मा, सुरेन्द्र चतुर्वेदी , श्याम शर्मा से मिलकर प्रशासन के बीच सेतु का काम किया। सिर्फ़ कर्मचारी नेता भवर सिंह राठौड़ के कुल्हाड़ी से हमले की वारदात ने ज़रूर रंग में भंग किया। खैर कुछ समय बाद प्रमोशन हुआ और जयपुर में मेरा तबादला सहायक निदेशक ग्रामीण विकास और पंचायती राज के पद पर हुआ। यहाँ मुझे विभाग की एक पत्रिका का संपादक बनाया गया। यह पत्रिका राजस्थान की प्रत्येक पंचायत, पंचायत समिति, जिला परिषदें, सभी विधायकों और मुख्य मंत्री के पास जाती। इस पत्रिका में पंचायत सम्बन्धित सभी नोटिफिकेशन, पंचायतो के विकास कार्य, और समीचीन लेख होते थे। निदेशक जी खुश थे पत्रिका की सामग्री और क्लेवर देखकर। लेकिन कुछ शिकायते आने लगी कि कई जगह पत्रिका नहीं मिलती। प्रिण्टर को ताकीद की लेकिन व्यवस्था न सुधरी। आख़िरकार मैं स्वयं पत्रिका के डिस्पैच के दिन पोस्ट ऑफ़िस गया और पत्रिका की गिनती की जो ९००० थी जबकि आदेश १८००० का था। जाँच में पता चला कि मुद्रक ९००० प्रतियाँ ही छाप रहा था एक सप्ताह एक तरफ़ और दूसरे सप्ताह दूसरी दिशा की पंचायत को पत्रिका भेजता। मैंने निदेशक जी को शिकायत की लेकिन कोई ख़ास असर नहीं पड़ा। क्योंकि प्रेस मालिक और निदेशक जी के दोस्ती के संबंध थे। मैंने अपने प्रयासों से जयपुर सूचना केन्द्र में स्थानातरण करवा लिया। वहाँ मुझे पुस्तकों का सानिध्य मिला और मैंने रात - दिन पढ़ के २०० सौ से जायदा लेख विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में लिखे। पंजाब केसरी में हर सप्ताह राजस्थान की संस्कृति, कला और किलों पर मेरे लेख छपते। मैंने सूचना केन्द्र में कई कवि सम्मेलन, साहित्य गोष्ठियां और प्रदर्शनियाँ आयोजित की जिसकी अखबारों में हमेशा चर्चा होती। कुछ सालो बाद पदोन्नति पर निदेशालय में उपनिदेशक प्रस्थापना के पद पर नियुक्ति हुई। निदेशालय के बजट का प्रभारी होने के साथ स्टोर का इंचार्ज भी मेरे पास था। यहाँ का माहोल कुछ अलग ही था यहाँ के कुछ चपरासी उच्च अधिकारियों के घरों पर काम करते थे और हाजरी यहाँ लगती थी। ऑफ़िस की दरिया, टेबले, कुर्सिया, सोफे, टी वी, वी सी आर उनके घरों की शोभा बढ़ाते थे। उनके टी ए आदि बिल्लों को पास कराने हेतु मुझे हस्ताक्षर करने होते थे। बड़ी मजबूरी और तनाव झेलते हुए मैं अपना कार्य कर रहा था। एक दिन निदेशक ने मुझे अपने पास बुला कर पूछा कि तुम हर समय टेंशन में क्यो रहते हो? मैंने भावा वेश में उन्हें अपने मन की व्यथा बताई कि मैं क्या करूँ जब एक सीनियर ऑफिसर झूठे बिल बनाता है विभाग की गाड़ी में जाकर टैक्सी किराए का बिल प्रस्तुत करता है तब दिल दुखता है क्योंकि मुझे उनके बिलो को भुगतान के लिए साइन करने होते है।और मुझे रात- भर नींद नहीं आती। निदेशक ने बताया कि मुझे सब कुछ मालूम है और मैं जानते हुए भी अनजान रहता हूँ क्योंकि हमारा सिस्टम ही ऐसा है इसमें दखल मत दो तकलीफ़ पाओगे। उन्होंने मुझे शिक्षा दी कि बहते पानी को हाथ देकर मत रोको, पानी रुकने पर कीचड़ हो जायेगा और आपके हाथो को लगेगा। बेहतर रहे कि पानी जैसे बहता है बहनें दो। अगर तुम बहते पानी के साथ नहीं मिल सकते और मन नहीं मानता तो अपने आपको उससे दूर रखो लेकिन पानी को बहने दो, जब पूरे सिस्टम ही ऐसा हो। बस फिर क्या मैंने अपने आपको बहते पानी से दूर किया जैसा हो रहा था होने दिया और फिर मैं चैन की नींद सोया। फिर मुझसे किसी को कोई शिकायत न रही।
हर बार परिचय कैसे दूं ,आप बीकानेर एक्सप्रेस के संपादक हैं, एक-एक शब्दों में सच झलकता है ,(मनोहर चावला )किसी परिचय के मोहताज नहीं
के कुमार आहूजा बीकानेर फ्रंटियर संपादक