मध्यस्थता प्रक्रिया को इस प्रकार व्याख्यायित किया जाए कि मध्यस्थता समझौता पूरी तरह लागू हो -राजस्थान उच्च न्यायालय
के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा 2024-12-09 18:39:59

राजस्थान उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सुधेश बंसल ने एक अहम आदेश में कहा है कि यदि किसी समझौते में अनुबंध की शर्तें मध्यस्थता (Arbitration) की प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं, तो उसे इस प्रकार से व्याख्यायित किया जाएगा कि पक्षों के बीच मध्यस्थता समझौते को पूरी तरह से लागू किया जा सके। यह निर्णय एक व्यापारिक विवाद से जुड़ा हुआ है, जिसमें एक खरीद आदेश के रद्द होने पर हुए नुकसान का मुद्दा है।
विवाद की पृष्ठभूमि
इस विवाद की शुरुआत एक दवाइयों की आपूर्ति के लिए दिए गए आदेश से हुई थी, जिसका मूल्य 33,26,904 रुपये था। अपीलकर्ता ने दावा किया कि आदेश मिलने के बाद उन्होंने दवाइयों का उत्पादन शुरू कर दिया था और 50% से अधिक उत्पादन भी कर लिया था। लेकिन अचानक ही, प्रतिवादी ने बिना किसी कारण के यह खरीद आदेश रद्द कर दिया, जिससे अपीलकर्ता को भारी नुकसान हुआ। इसके बाद, अपीलकर्ता ने इस मामले को मध्यस्थता के जरिए हल करने के लिए आवेदन किया।
मध्यस्थता के लिए आवेदन और तर्क
अपीलकर्ता ने अपनी याचिका में कहा कि अनुबंध के क्लॉज 22(2) के तहत मध्यस्थता का प्रावधान है, लेकिन इस क्लॉज में मध्यस्थ का चयन करने के लिए कोई तंत्र नहीं है। दूसरी ओर, प्रतिवादी ने यह तर्क दिया कि अनुबंध में जो मध्यस्थता का प्रावधान है, वह आवश्यक तत्वों से युक्त नहीं है। उनका कहना था कि मध्यस्थ के निर्णय को अंतिम और बाध्यकारी नहीं बताया गया, जो एक मध्यस्थता समझौते का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है।
न्यायालय की टिप्पणियाँ
न्यायमूर्ति सुधेश बंसल ने कहा कि यह एक स्थापित कानूनी सिद्धांत है कि यदि किसी अनुबंध में ऐसी कोई शर्त हो जो मध्यस्थता के दायरे को कम करने का प्रयास करती हो, तो इसे इस तरह से व्याख्यायित किया जाएगा जिससे मध्यस्थता समझौते का पूरा प्रभाव हो। न्यायालय ने यह भी कहा कि क्लॉज 22(2) में यह स्पष्ट होता है कि दोनों पक्ष विवादों को मध्यस्थता के माध्यम से हल करने के लिए सहमत हैं। साथ ही, इस क्लॉज में यह भी नहीं कहा गया कि मध्यस्थ का निर्णय अंतिम और बाध्यकारी नहीं होगा। इस प्रकार, न्यायालय ने कहा कि यह उचित होगा कि विवाद को मध्यस्थता के जरिए ही हल किया जाए।
न्यायालय का निर्णय
इसके बाद, उच्च न्यायालय ने अपीलकर्ता की याचिका को स्वीकार किया और विवाद का समाधान करने के लिए एक एकल मध्यस्थ को नियुक्त करने का आदेश दिया। यह आदेश मध्यस्थता के महत्व को पुनः स्थापित करता है और यह संकेत करता है कि जब भी मध्यस्थता का प्रावधान किसी अनुबंध में है, तो उसे लागू किया जाएगा, भले ही उसमें कुछ खामियां क्यों न हों।
इस फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया कि व्यापारिक और कानूनी विवादों को मध्यस्थता के माध्यम से हल करना आवश्यक हो सकता है, खासकर जब दोनों पक्षों के बीच स्पष्ट मध्यस्थता समझौता होता हो। राजस्थान उच्च न्यायालय का यह आदेश व्यापारी समुदाय और अन्य पेशेवरों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह मध्यस्थता को एक प्रभावी और कानूनी तरीका मान्यता देता है।