भारत की नागरिकता: सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के तहत दिया अहम आदेश


  2024-12-09 11:48:21



 

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) 2019 का उल्लेख करते हुए एक अहम आदेश दिया। यह आदेश उस व्यक्ति के नागरिकता के दावे को मंजूरी देने से संबंधित था, जो 1969 में पूर्व पाकिस्तान (अब बांगलादेश) से भारत आकर बस गया था। कोर्ट ने यह फैसला दिया कि इस व्यक्ति को 'अवैध प्रवासी' नहीं माना जाएगा, जैसा कि नागरिकता अधिनियम की धारा 2(1)(b) में संशोधन के तहत निर्धारित किया गया है।

नागरिकता संशोधन अधिनियम का संदर्भ

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) 2019 के तहत, पाकिस्तान, बांगलादेश और अफगानिस्तान से भारत में 31 दिसंबर 2014 तक आने वाले हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी, और ईसाई समुदाय के व्यक्तियों को भारतीय नागरिकता मिल सकती है। यह विशेष प्रावधान उन लोगों को 'अवैध प्रवासी' के रूप में नहीं देखता जो बिना वैध दस्तावेजों के भारत आए थे, बशर्ते वे 31 दिसंबर 2014 से पहले भारत में प्रवेश कर चुके हों। इस निर्णय ने एक बार फिर नागरिकता कानून की अहमियत को उजागर किया है।

आवेदनकर्ता का मामला और उसका संघर्ष

आवेदनकर्ता, जो 1969 में अपने पिता के साथ पूर्व पाकिस्तान से भारत आया था, ने पश्चिम बंगाल सरकार में सरकारी नौकरी पाने के लिए नागरिकता प्रमाण पत्र के लिए आवेदन किया था। 1985 में उसे नियुक्ति मिल गई थी, लेकिन पुलिस सत्यापन रिपोर्ट में यह पाया गया कि उसकी नागरिकता सिद्ध नहीं हो सकी थी। इसके कारण उसे 2011 में नौकरी से हटा दिया गया और उसके सेवानिवृत्ति लाभ भी रोके गए।

आवेदनकर्ता ने अपने पिता के प्रवासन प्रमाण पत्र को आधार बनाकर भारतीय नागरिकता की मांग की, लेकिन राज्य ने इसे नकारते हुए कहा कि केवल प्रवासन प्रमाण पत्र से नागरिकता स्थापित नहीं हो सकती और उसे नागरिकता के पंजीकरण की आवश्यकता है।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय: नागरिकता संशोधन अधिनियम की भूमिका

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में आवेदनकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाया। न्यायमूर्ति महादेवन और न्यायमूर्ति महेश्वरी की बेंच ने माना कि आवेदनकर्ता को भारतीय नागरिकता पंजीकरण के माध्यम से मिल सकती है, क्योंकि वह भारतीय मूल का है और उसके दादा-दादी भारतीय नागरिक थे। अदालत ने यह भी कहा कि नागरिकता संशोधन अधिनियम के तहत, आवेदनकर्ता को भारतीय नागरिकता मिलेगी, क्योंकि वह एक गैर-मुस्लिम व्यक्ति है और 1969 में भारत आया था, जो 31 दिसंबर 2014 से पहले था।

केंद्र सरकार की नीति और अदालत की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की नीति को स्पष्ट करते हुए कहा कि 2019 के संशोधन से यह स्पष्ट हो गया था कि पड़ोसी देशों से आने वाले अल्पसंख्यक समुदायों को अवैध प्रवासी नहीं माना जाएगा। यह उन व्यक्तियों को नागरिकता देने का एक स्पष्ट संकेत है जो समय से पहले भारत आए थे, जैसे कि इस मामले में आवेदनकर्ता। अदालत ने इस प्रावधान के तहत नागरिकता के लाभ प्रदान किए और राज्य को आदेश दिया कि वह आवेदनकर्ता को सेवानिवृत्ति लाभ दे।

यह फैसला भारतीय नागरिकता कानून और नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) 2019 के प्रभाव को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिकता प्राप्त करने के लिए केवल प्रवासन प्रमाण पत्र का होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि पंजीकरण भी आवश्यक है। साथ ही, नागरिकता संशोधन अधिनियम के तहत गैर-मुस्लिम प्रवासियों को विशेष लाभ देने का निर्णय एक अहम कदम है, जो भारत की विविधता और सहिष्णुता की मिसाल प्रस्तुत करता है।

यह निर्णय उन लोगों के लिए उम्मीद की किरण है जो विभिन्न कारणों से भारत में आए थे और अब भारतीय नागरिकता के पात्र हैं।


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