सहकारी समितियों में परिवारवाद पर लगाम लगाने के लिए संशोधन करें -सुप्रीम कोर्ट
के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा 2024-12-09 06:57:08

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में उत्तर प्रदेश (UP) सरकार से सहकारी समितियों और अन्य कानूनी संस्थाओं से जुड़े कानूनों में उपयुक्त संशोधन प्रस्तावित करने को कहा है, ताकि राज्य के अधिकारियों के परिवार के सदस्य या उनके पति/पत्नी को ‘एक्स ऑफिशियो’ (कानूनी रूप से नियुक्त) पदों पर बैठाने की प्रथा को रोका जा सके। यह आदेश एक महत्वपूर्ण कदम है, जो राज्य की प्रशासनिक प्रक्रियाओं को और पारदर्शी और लोकतांत्रिक बनाने की दिशा में उठाया गया है।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश और समयसीमा
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने न्यायमूर्ति सूर्य कांत और न्यायमूर्ति उज्जल भुयान की अध्यक्षता में यह आदेश दिया। अदालत ने राज्य सरकार को छह सप्ताह का समय दिया है ताकि वह सहकारी समितियों, राज्य सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट या अन्य ऐसे कानूनों में आवश्यक संशोधन प्रस्तावित कर सके, जिनके तहत सहकारी समितियां, सोसाइटियां, ट्रस्ट या अन्य कानूनी संस्थाएं पंजीकृत होती हैं। कोर्ट ने 2 दिसंबर को अपने आदेश में कहा, "संशोधित प्रावधान यह सुनिश्चित करेंगे कि समितियों के नियम और विनियम उस उपनिवेशी मानसिकता से मुक्त हों, जिसमें राज्य के अधिकारियों के परिवार के सदस्य या उनके पति/पत्नी को ‘एक्स ऑफिशियो’ पदों पर नियुक्त किया जाता है।"
लोकतांत्रिक मूल्यों को प्राथमिकता देने की आवश्यकता
कोर्ट ने आगे कहा कि संशोधित प्रावधानों का उद्देश्य यह होना चाहिए कि राज्य द्वारा वित्तपोषित कानूनी संस्थाएं या ऐसे ट्रस्ट लोकतांत्रिक मूल्यों की ओर उन्मुख हों। इसके तहत, संस्थाओं के अधिकांश सदस्य सही तरीके से चुने जाएं। अदालत ने यह भी कहा कि इन संशोधनों के बाद, राज्य के ऐसे संस्थानों पर यह जिम्मेदारी होगी कि वे मॉडल बाईलॉज (नियम) का पालन करें। यदि कोई संस्था इन नियमों का पालन करने से इंकार करती है, तो उसे कानूनी रूप से अस्तित्वहीन घोषित किया जा सकता है, साथ ही उसे सरकारी सहायता से भी वंचित किया जा सकता है।
संशोधन के लिए फरवरी 2025 तक का समय
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को यह निर्देश दिया कि वह फरवरी 2025 तक इस संबंध में एक उपयुक्त मसौदा प्रस्ताव अदालत के सामने रखे। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह संशोधन, न केवल ‘एक्स ऑफिशियो’ पदों को समाप्त करने के लिए है, बल्कि यह उन संस्थाओं को भी लोकतांत्रिक रूप से संचालित करने का मार्गदर्शन देगा, जो राज्य की सहायता से संचालित होती हैं।
वकीलों की उपस्थिति
इस मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता तपेश कुमार सिंह, मोहम्मद वकास, अमरजीत गुप्ता और फरहा नाज ने समिति के लिए अदालत में अपना पक्ष रखा। वहीं, राज्य उत्तर प्रदेश की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज और वकील हरिश पांडे ने पक्ष रखा। अन्य प्रतिवादियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विश्वजीत सिंह, वकील वीर कौल सिंह, सूर्यांश सिंह और रिधिमा सिंह ने अदालत में पेश होकर अपना पक्ष रखा।
यह आदेश एक अहम कदम है, जो राज्य के प्रशासनिक ढांचे में पारदर्शिता और लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करेगा। इससे न केवल उत्तर प्रदेश की सहकारी समितियां और अन्य कानूनी संस्थाएं प्रभावित होंगी, बल्कि यह पूरे देश के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत कर सकता है। राज्य सरकार को अब फरवरी 2025 तक संशोधित कानूनों का मसौदा तैयार करने के लिए कहा गया है। यह कदम भ्रष्टाचार और परिवारवाद के खिलाफ उठाया गया एक अहम कदम माना जा रहा है।