NDPS एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: गैजेटेड अधिकारी की भूमिका पर स्पष्टता


के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा  2024-12-08 08:44:12



 

सुप्रीम कोर्ट ने एनडीपीएस (नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंस) एक्ट, 1985 की धारा 50 के प्रावधानों की व्याख्या करते हुए कहा कि किसी संदिग्ध को तलाशी से पहले यह अधिकार दिया जाना चाहिए कि वह किसी गैर-छापेमार टीम के गैजेटेड अधिकारी या मजिस्ट्रेट के सामने तलाशी की मांग कर सकता है। यह फैसला दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाले मामले में आया, जिसमें एक आरोपी मोहम्मद जाबिर को जमानत दी गई थी।

दिल्ली हाई कोर्ट का निर्णय और सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया

दिल्ली हाई कोर्ट ने जमानत देते हुए कहा था कि धारा 50 के तहत नोटिस में 'निकटतम गैजेटेड अधिकारी' का उल्लेख होना चाहिए, न कि 'किसी भी गैजेटेड अधिकारी' का। उच्च न्यायालय ने माना कि नोटिस में स्पष्टता की कमी थी, जिससे आरोपी को जमानत मिली।

सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि 'निकटतम' और 'किसी भी' गैजेटेड अधिकारी के संदर्भ में कोई बड़ा अंतर नहीं है। मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने स्पष्ट किया कि तलाशी प्रक्रिया में देरी नहीं होनी चाहिए, और यदि 'निकटतम' अधिकारी की व्याख्या के चलते समय की बर्बादी होती है, तो यह प्रावधान के उद्देश्य को विफल कर देगा।

अदालत में तर्क और बहस

राज्य की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने तर्क दिया कि दिल्ली हाई कोर्ट का आदेश अन्य एनडीपीएस मामलों में संदर्भ के रूप में उपयोग किया जा रहा है, जिससे न्याय प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। आरोपी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुक्ता गुप्ता ने कहा कि नोटिस की भाषा धारा 50 के प्रावधानों का उल्लंघन करती है और इस वजह से तलाशी प्रक्रिया वैध नहीं थी।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य की अपील को स्वीकार कर लिया और आरोपी की जमानत रद्द कर दी। कोर्ट ने कहा कि नोटिस में 'गैजेटेड अधिकारी' के संदर्भ में अस्पष्टता को लेकर हाई कोर्ट का निर्णय गलत था।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि तलाशी प्रक्रिया को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने के लिए यह जरूरी है कि तलाशी करने वाला अधिकारी छापेमार टीम का हिस्सा न हो।

धारा 50 और तलाशी प्रक्रिया का उद्देश्य

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 50 का मुख्य उद्देश्य संदिग्ध को यह जानकारी देना है कि उसे एक स्वतंत्र और निष्पक्ष अधिकारी के सामने तलाशी का अधिकार है। यह प्रावधान तलाशी प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने और आरोपी के अधिकारों की रक्षा के लिए है।

दिल्ली हाई कोर्ट का तर्क और सुप्रीम कोर्ट की असहमति

दिल्ली हाई कोर्ट ने यह माना था कि 'निकटतम गैजेटेड अधिकारी' का मतलब स्वतंत्रता और निष्पक्षता सुनिश्चित करना है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट का यह तर्क व्यावहारिकता और प्रक्रिया के तात्कालिक उद्देश्यों को ध्यान में नहीं रखता।

यह फैसला तलाशी और गिरफ्तारी के मामलों में अधिकारों और प्रक्रियाओं की व्याख्या को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल पेश करता है। यह सुनिश्चित करता है कि एनडीपीएस एक्ट के तहत तलाशी प्रक्रिया पारदर्शी हो, लेकिन साथ ही व्यावहारिक और त्वरित हो।


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