सार्वजनिक सेवकों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति: सर्वोच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण निर्णय


  2024-12-07 18:10:02



 

हाल ही में, सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि जब किसी सार्वजनिक सेवक के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति पहले ही अस्वीकृत की जा चुकी हो, तो वही सामग्री प्रस्तुत करने पर पुनः स्वीकृति नहीं दी जा सकती, जब तक कि नए साक्ष्य या सामग्री प्रस्तुत न की जाए।

मामले की पृष्ठभूमि

तेलंगाना उच्च न्यायालय ने सी. शोभा रानी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं, जैसे 420 (धोखाधड़ी), 467 (मूल्यवान सुरक्षा का जालसाजी), 468 (धोखाधड़ी के उद्देश्य से जालसाजी), 471 (जाली दस्तावेज का वास्तविक के रूप में उपयोग), 120B (आपराधिक साजिश) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(2) के तहत आरोपों को खारिज कर दिया था। उच्च न्यायालय ने यह माना कि अभियोजन स्वीकृति पुनः वही सामग्री प्रस्तुत करने पर दी गई थी, जिस पर पहले अस्वीकृति दी गई थी।

सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय

सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के निर्णय को आंशिक रूप से स्वीकार किया। न्यायालय ने कहा कि यदि अभियोजन स्वीकृति पहले ही अस्वीकृत की जा चुकी हो, तो वही सामग्री प्रस्तुत करने पर पुनः स्वीकृति नहीं दी जा सकती, जब तक कि नए साक्ष्य या सामग्री प्रस्तुत न की जाए। हालांकि, न्यायालय ने उच्च न्यायालय की आलोचना की कि उसने आरोपों की सामग्री की जांच नहीं की और केवल अभियोजन स्वीकृति के आधार पर आरोपों को खारिज किया।

न्यायालय की टिप्पणी

न्यायालय ने कहा, "हम उच्च न्यायालय की राय से सहमत हैं कि केवल राय में परिवर्तन से अभियोजन स्वीकृति को स्थायी नहीं किया जा सकता, क्योंकि कोई नया साक्ष्य या आधार प्रस्तुत नहीं किया गया है जो पूर्व स्वीकृति के निर्णय को पलट सके।" हालांकि, न्यायालय ने यह भी माना कि उच्च न्यायालय ने आरोपों की सामग्री की जांच नहीं की, जो आवश्यक था।

अगला कदम

न्यायालय ने मामले को उच्च न्यायालय में पुनः विचार के लिए भेजा, ताकि आरोपों की सामग्री की जांच की जा सके और उचित निर्णय लिया जा सके। न्यायालय ने उच्च न्यायालय से चार महीने के भीतर इस पर निर्णय लेने का निर्देश दिया।

यह निर्णय सार्वजनिक सेवकों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति के महत्व को दर्शाता है और न्यायालयों को आरोपों की सामग्री की गहन जांच करने की आवश्यकता को रेखांकित करता है।


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