आयकर न्यायालय के आदेश पर इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: कानूनी प्रश्न नहीं है


के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा  2024-12-07 08:31:30



 

क्या किसी करदाता का मामला न्यायालय में केवल इसलिए खारिज किया जा सकता है क्योंकि उसके खिलाफ कोई अपराधिक गलती नहीं दिखाई जा सकती? इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर फैसला सुनाया है, जिसमें आयकर आयुक्त और ट्रिब्यूनल के बीच के विवाद पर अपना अंतिम रुख स्पष्ट किया। आइए जानें, इस फैसले में क्या खास था और क्या था वह विवाद जिससे यह मामला कोर्ट तक पहुंचा।

मामले का संक्षिप्त विवरण

यह मामला 2017-18 के आयकर वर्ष के लिए करदाता के मामले से जुड़ा हुआ है, जिसे आयकर विभाग ने गहन जांच के तहत उठाया था। करदाता का मामला कंप्यूटर-सहायता प्राप्त चयन द्वारा छानबीन के लिए चुना गया था। इसके बाद, आयकर अधिकारी (A.O.) ने धारा 142(1) के तहत नोटिस जारी किए और कई प्रश्नावली भेजी। करदाता ने सभी नोटिसों का जवाब दिया और आयकर अधिकारी ने दस्तावेजों की जांच करने के बाद कोई प्रतिकूल निष्कर्ष नहीं निकाला और आयकर रिटर्न को स्वीकार कर लिया।

लेकिन, प्रधान आयकर आयुक्त (P.C.I.T.) ने पाया कि आयकर अधिकारी द्वारा पारित आदेश गलत था और यह राजस्व के हितों के लिए हानिप्रद था। इसके बाद, P.C.I.T. ने आयकर अधिकारी के आदेश को निरस्त करते हुए उसे विशेष जांच करने का निर्देश दिया।

न्यायालय में अपील और जवाब

P.C.I.T. के आदेश के खिलाफ करदाता ने ट्रिब्यूनल में अपील की, जहां ट्रिब्यूनल ने पाया कि आयकर अधिकारी ने सभी नियमों का पालन किया था और उनके द्वारा पारित आदेश को सही ठहराया। ट्रिब्यूनल ने कहा कि आयकर अधिकारी ने सभी आवश्यक जांच की थी। इसके बाद, P.C.I.T. ने उच्च न्यायालय में अपील दायर की।

विभागीय अपील और स्पष्टीकरण

विभाग ने अपनी अपील में यह तर्क दिया कि आयकर अधिकारी ने बिना जांच या सत्यापन के आदेश पारित किए थे। विभाग का दावा था कि मामला धारा 263(1) की व्याख्या 2 के तहत आता है, जो यह कहता है कि अगर किसी आदेश में पर्याप्त जांच या सत्यापन नहीं किया गया हो तो उसे आयकर आयुक्त द्वारा गलत और राजस्व के लिए हानिप्रद माना जा सकता है। विभाग ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ दस्तावेज़ ट्रिब्यूनल के समक्ष पेश किए गए थे, जो रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं थे।

ट्रिब्यूनल का रुख और हाई कोर्ट का निर्णय

वहीं, करदाता ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि आयकर अधिकारी ने सभी संबंधित नियमों और प्रक्रियाओं का पालन करते हुए आदेश पारित किया था। उन्होंने यह भी कहा कि विभाग का यह दावा कि आयकर अधिकारी ने सही तरीके से जांच नहीं की, गलत था।

हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद ट्रिब्यूनल के आदेश को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि ट्रिब्यूनल ने रिकॉर्ड की पूरी जांच की और पाया कि P.C.I.T. द्वारा उठाए गए सवाल बिना किसी ठोस आधार के थे। न्यायालय ने यह भी कहा कि यदि ट्रिब्यूनल ने रिकॉर्ड की पूरी जांच के बाद यह निष्कर्ष निकाला था, तो इस पर पुनर्विचार करने की कोई आवश्यकता नहीं थी।

हाई कोर्ट के जस्टिस का निर्णय

न्यायमूर्ति अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति विकास बुधवार की खंडपीठ ने अपने निर्णय में कहा, "चूंकि ट्रिब्यूनल ने रिकॉर्ड की गहन जांच के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि P.C.I.T. के आधार पर उठाए गए सवाल बिना किसी तथ्यात्मक आधार के थे, इसलिए इस मामले में कोई महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न नहीं उठता है।"

इस प्रकार, हाई कोर्ट ने P.C.I.T. की अपील को खारिज कर दिया और ट्रिब्यूनल के आदेश को बरकरार रखा।

भविष्य की दिशा

यह मामला एक महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है कि उच्च न्यायालय और आयकर ट्रिब्यूनल के बीच कैसे फैसलों की समीक्षा की जाती है। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि अगर ट्रिब्यूनल ने सभी रिकॉर्ड की जांच कर निष्कर्ष पर पहुंचा है, तो उस फैसले को चुनौती देना पर्याप्त नहीं होता, जब तक कि उस फैसले में कोई गलती या अपवृत्ति न हो।


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