सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय: अवमानना मामले में एकल पीठ के आदेश को चुनौती देने का अधिकार
के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा 2024-12-06 09:11:33

एकल पीठ के आदेश पर नई सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय में यह स्पष्ट किया है कि एकल पीठ द्वारा contempt मामलों में दिए गए आदेशों को चुनौती देने का अधिकार डिवीजन बेंच को है। यह आदेश कोर्ट की अवमानना से संबंधित मामलों में एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है, जिसमें एकल पीठ के द्वारा किसी आदेश को पारित किया जाता है, जो अवमानना कार्यवाही शुरू करने से इनकार करता है, या कार्यवाही को समाप्त करता है, या दोषी को बरी करता है। इस आदेश को अब अपील के रूप में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।
कानूनी मामले का संदर्भ: इलाहाबाद हाई कोर्ट का आदेश
यह मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट के लखनऊ बेंच का था, जहाँ एकल पीठ ने 5 जनवरी 2022 को एक आदेश पारित किया था। इस आदेश में यह कहा गया था कि याचिकाकर्ता ने कोर्ट के पिछले आदेश का उल्लंघन नहीं किया और इसलिए अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की आवश्यकता नहीं थी। यह मामला एक सेवा संबंधित विवाद से जुड़ा था, जिसमें हाई कोर्ट ने अप्रैल 2015 में एक आदेश दिया था कि कॉलेज को कर्मचारी को फिर से सेवा में बहाल करना होगा।
उच्च न्यायालय के आदेश पर विवाद: अवमानना कार्यवाही की मांग
हालाँकि, बाद में जब उच्च न्यायालय ने एक अंतरिम आदेश पारित किया, जिसमें कर्मचारी को संस्थान में 15 दिनों के भीतर जॉइनिंग रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया, तो कॉलेज ने इस आदेश को लागू करने में देरी की। इसके बाद याचिकाकर्ता ने अवमानना कार्यवाही की मांग की। कॉलेज का तर्क था कि कर्मचारी ने 2015 के फैसले के बाद संस्थान में शामिल होने का प्रयास नहीं किया, और उसने कहीं और नौकरी जॉइन की थी। इस मामले में अवमानना कार्यवाही की मांग की गई थी, लेकिन उच्च न्यायालय ने इसे खारिज कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट में अपील: याचिकाकर्ता की दलील
याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट संजीव कुमार सिंह ने तर्क दिया कि चूंकि एकल पीठ ने अवमानना आवेदन पर मामले के merits (मुख्य मुद्दे) पर विचार किया था, इसलिए मिदनापुर बैंक केस के अनुसार दूसरी अपील का अस्तित्व होना चाहिए। उनका कहना था कि इस स्थिति में दूसरी अपील स्वीकार्य होगी, जैसा कि मिदनापुर केस के पैरा 11 के क्लॉज V में उल्लेखित था।
सुप्रीम कोर्ट का निष्कर्ष: मामले में merits पर कोई निर्णय नहीं
हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता की इस दलील से असहमत होते हुए मिदनापुर बैंक केस के क्लॉज II का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि एकल पीठ के आदेश में न तो अवमानना कार्यवाही शुरू करने का निर्णय था और न ही किसी प्रकार की merits पर कोई निर्णय लिया गया था। इसका मतलब था कि इस आदेश को चुनौती देने का कोई आधार नहीं था, सिवाय सुप्रीम कोर्ट में सीधे अपील करने के।
कोर्ट का आदेश: प्रक्रिया के मुताबिक निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि एकल पीठ द्वारा अवमानना कार्यवाही शुरू करने या न करने के निर्णय के खिलाफ अपील की कोई जगह नहीं होती, जैसा कि Contempt of Courts Act की धारा 19 में उल्लेखित है। ऐसे आदेश केवल विशिष्ट परिस्थितियों में ही Article 136 के तहत सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दिए जा सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट का कड़ा संदेश: एकल पीठ के आदेश को चुनौती देने की प्रक्रिया
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दिए गए आदेश पर यह भी कहा कि किसी एकल पीठ का आदेश, जो अवमानना कार्यवाही शुरू करने से इनकार करता है, या ऐसे किसी व्यक्ति को बरी करता है, जिसे अवमानना का दोषी पाया गया हो, सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। इस प्रकार, यह आदेश उन मामलों में महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करता है जहाँ अवमानना से जुड़ी अपीलें एकल पीठ से डिवीजन बेंच तक या फिर सीधे सुप्रीम कोर्ट में लाई जा सकती हैं।
उच्च न्यायालय के आदेश को खारिज किया गया
सुप्रीम कोर्ट ने अंततः याचिकाकर्ता के द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया और एकल पीठ के आदेश को बनाए रखा। इससे यह साबित हुआ कि अवमानना मामलों में केवल प्रक्रिया के अनुसार ही कार्यवाही की जाएगी, और किसी भी तरह के निर्णय को बिना उचित आधार के चुनौती नहीं दी जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक कदम
सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से यह स्पष्ट हो गया है कि अवमानना कार्यवाही से संबंधित मामलों में एकल पीठ के आदेश को चुनौती देने का अधिकार सीमित है और इसे केवल विशेष परिस्थितियों में ही चुनौती दी जा सकती है। कोर्ट ने यह सुनिश्चित किया है कि इस प्रकार के मामलों में प्रक्रिया और कानून के तहत कार्यवाही की जाए और न कि किसी भी प्रकार के अव्यावहारिक या अनुचित आधार पर अपील की जाए।