सुप्रीम कोर्ट की तल्ख़ टिप्पणी: एनजीटी ने अपने निर्णय के लिए समिति की राय का सहारा लिया


के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा  2024-12-05 15:21:16



 

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एनजीटी, जो पर्यावरणीय मामलों के निपटारे के लिए एक विशेष ट्रिब्यूनल है, अपने निर्णय के लिए बाहरी समितियों की राय पर निर्भर नहीं रह सकता। यह टिप्पणी एनजीटी द्वारा M/s Grasim Industries के खिलाफ आदेश पारित करने के मामले में की गई।

एनजीटी का गठन और कानूनी दायित्व

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने कहा कि एनजीटी को 2010 के नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल अधिनियम के तहत स्थापित किया गया था। यह ट्रिब्यूनल स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने के लिए बाध्य है। कोर्ट ने कहा, "एनजीटी एक ऐसा ट्रिब्यूनल है जिसे मामले के सभी तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करते हुए अपना निर्णय स्वयं करना चाहिए। वह अपनी राय को किसी अन्य समिति के हाथों में नहीं छोड़ सकता।"

मामले की पृष्ठभूमि और एनजीटी का आदेश

यह मामला M/s Grasim Industries पर एनजीटी द्वारा एक समिति की रिपोर्ट के आधार पर लगाए गए जुर्माने से जुड़ा था। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि कंपनी को न तो मामले में पार्टी बनाया गया और न ही उसे कोई नोटिस दिया गया। एनजीटी ने सीधे तौर पर समिति की रिपोर्ट के आधार पर आदेश पारित कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने इसे "किसी व्यक्ति को बिना सुने दंडित करने का मामला" बताया और इसे न्याय के मूलभूत सिद्धांतों के खिलाफ बताया।

सुप्रीम कोर्ट का कानूनी दृष्टिकोण

सुप्रीम कोर्ट ने 2022 के कांथा विभाग युवा कोली समाज परिवर्तन ट्रस्ट बनाम गुजरात राज्य मामले का उल्लेख किया। उस निर्णय में स्पष्ट किया गया था कि एनजीटी अपने न्यायिक कर्तव्यों को विशेषज्ञ समितियों को नहीं सौंप सकता। कोर्ट ने कहा कि ट्रिब्यूनल का कार्य केवल समिति की रिपोर्ट पर आधारित नहीं हो सकता, बल्कि उसे खुद तथ्यों और परिस्थितियों का गहन अध्ययन करना होगा।

मामले का निपटारा और नए सिरे से विचार का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने एनजीटी के आदेश को खारिज करते हुए मामले को नए सिरे से विचार के लिए ट्रिब्यूनल को वापस भेजा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी प्रकार का प्रतिकूल आदेश पारित करने से पहले Grasim Industries को अपनी बात रखने का अवसर दिया जाना चाहिए।

पारदर्शिता और निष्पक्षता की आवश्यकता

यह निर्णय न्यायपालिका के मूल सिद्धांतों को बनाए रखने और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय इस बात की याद दिलाता है कि न्यायिक प्रक्रियाओं में किसी भी पक्ष को सुने बिना निर्णय लेना न केवल गलत है, बल्कि यह न्याय के साथ भी अन्याय है।


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