महिलाओं के लिए सार्वजनिक शौचालयों की स्थिति पर राजस्थान हाई कोर्ट का सख्त रुख
के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा 2024-12-05 07:22:29

राजस्थान हाई कोर्ट ने महिलाओं के लिए सार्वजनिक शौचालयों की कमी और उनकी स्वास्थ्य समस्याओं पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। कोर्ट ने यह मामला स्वत: संज्ञान में लिया है, जिसमें महिलाओं के लिए स्वच्छ और सुरक्षित शौचालयों की भारी कमी की बात कही गई है। न्यायमूर्ति अनूप कुमार धांद की पीठ ने इस पर तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को आवश्यक कदम उठाने के लिए निर्देश दिए हैं।
स्वच्छ शौचालयों की कमी: महिलाओं के स्वास्थ्य पर गंभीर असर
राजस्थान हाई कोर्ट ने कहा कि सड़क पर चलने वाली महिलाओं के लिए उपलब्ध शौचालय सुविधाएं न के बराबर हैं और ये सुविधाएं महिलाओं की जनसंख्या के अनुपात में बहुत ही कम हैं। कोर्ट ने बताया कि जहां एक तरफ आधारभूत सुविधाओं की कमी है, वहीं जो सुविधाएं उपलब्ध हैं, वे भी बेहद असंतोषजनक और निम्न गुणवत्ता की हैं। इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को संबंधित विभागों से रिपोर्ट मांगी है कि वे इस मुद्दे के समाधान के लिए क्या कदम उठा रहे हैं।
महिलाओं का पानी कम पीने के कारण स्वास्थ्य समस्याएं
कोर्ट ने एक हिंदी स्थानीय समाचार पत्र में प्रकाशित रिपोर्ट का उल्लेख किया, जिसमें बताया गया था कि महिलाओं को सार्वजनिक शौचालयों की कमी के कारण पानी पीने से भी बचना पड़ता है। रिपोर्ट में कहा गया था कि कार्यरत महिलाएं शौचालय के डर से पानी पीने से परहेज करती हैं, जिससे उन्हें स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हो रही हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि महिलाओं को बाथरूम की कमी के कारण या तो पेशाब रोकना पड़ता है या पानी का सेवन कम करना पड़ता है, जो स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है और यूरो-गाइनकोलॉजिकल समस्याओं का कारण बन सकता है।
महिलाओं के लिए शौचालयों की अधिक आवश्यकता: पुरुषों की तुलना में अधिक सुविधाओं की जरूरत
कोर्ट ने यह भी कहा कि शौचालयों की समस्या सभी उपयोगकर्ताओं को प्रभावित करती है, लेकिन विशेष रूप से महिलाओं को यह समस्या अधिक होती है। पुरुषों के पास शौचालयों की अधिक सुविधाएं हैं, जैसे कि युरिनल और अधिक पुरुषों के लिए शौचालय ब्लॉक होते हैं। वहीं, महिलाओं के लिए शौचालय की आवश्यकता अधिक होती है, खासकर जैविक कारणों से। कोर्ट ने यह भी कहा कि मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को शौचालय की जरूरत और भी बढ़ जाती है।
संविधान और अंतरराष्ट्रीय मानकों पर आधारित कोर्ट की टिप्पणी
राजस्थान हाई कोर्ट ने महिलाओं के शौचालयों के अधिकार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त अधिकार के रूप में रेखांकित किया। कोर्ट ने विश्व स्वास्थ्य संगठन की प्रस्तावना, 1948 के सार्वभौमिक मानव अधिकार घोषणा पत्र, और 19 नवंबर को मनाए जाने वाले विश्व शौचालय दिवस का संदर्भ दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए कहा कि एक सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार मानव गरिमा के तहत शारीरिक आवश्यकताओं को पूरा करने में निहित है।
राज्य की जिम्मेदारी: महिलाओं के लिए सुरक्षित और स्वच्छ शौचालयों की उपलब्धता
कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 47 और राजस्थान नगरपालिकाओं अधिनियम, 2009 का संदर्भ देते हुए राज्य और निगमों की जिम्मेदारी को रेखांकित किया। कोर्ट ने यह कहा कि महिलाओं का अधिकार है कि उन्हें सभी सुविधाजनक स्थानों पर सुरक्षित और स्वच्छ शौचालय मिलें, जो उनके मानव गरिमा के अधिकार पर असर डालता है। राज्य और निगमों की प्राथमिक जिम्मेदारी है कि वे सार्वजनिक स्वास्थ्य को सुधारें और महिलाओं के लिए शौचालय प्रदान करें।
केंद्र और राज्य सरकारों से रिपोर्ट की मांग
राजस्थान हाई कोर्ट ने इस मुद्दे पर स्वत: संज्ञान लेते हुए इसे "सार्वजनिक हित याचिका" के रूप में लिया। कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों के संबंधित मंत्रालयों और विभागों को नोटिस जारी कर उनसे रिपोर्ट मांगने का आदेश दिया। यह रिपोर्ट यह बताएगी कि सरकार इस समस्या के समाधान के लिए क्या प्रभावी कदम उठा रही है। मामले की अगली सुनवाई 7 जनवरी, 2025 को होगी।